संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ। संसद और राज्य विधायिका की संरचना, कार्य, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
संदर्भ: हाल ही में, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (DGPs) के चयन संबंधी नियमों में संशोधन किया है।
अन्य संबंधित जानकारी
- यह कदम राज्यों द्वारा DGPs की नियुक्ति में देरी और अनियमितताओं के संबंध में ऐतिहासिक ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ वाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का बार-बार उल्लंघन करने के बाद उठाया गया है।
- UPSC ने स्पष्ट किया है कि राज्यों को DGP की नियुक्तियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा।
- नेतृत्व में निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को वर्तमान DGP की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले प्रस्ताव भेजना आवश्यक है।
- यह स्पष्टीकरण राज्यों द्वारा नाम भेजने में बार-बार होने वाली देरी और न्यायिक निर्देशों के विपरीत कार्यवाहक या अस्थाई DGPs नियुक्त करने की घटनाओं के बाद दिया गया है।
नियुक्ति प्रक्रिया में मुख्य बदलाव
- अनिवार्य समय-सीमा: राज्यों को पद रिक्त होने से 3 महीने पहले प्रस्ताव भेजना अनिवार्य है।
- विलंब हेतु सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति: किसी भी विलंब (मृत्यु/इस्तीफे जैसे असाधारण मामलों को छोड़कर) के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुमति या स्पष्टीकरण प्राप्त करना आवश्यक है।
- UPSC का सीमित विवेकाधिकार: UPSC विलंबित प्रस्ताव के आधार पर चयन प्रक्रिया तब तक शुरू नहीं कर सकता, जब तक कि ऐसे विलंब को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से अनुमति न दी गई हो या क्षमा न किया गया हो।
- कठोर चयन प्रक्रिया: UPSC तीन पात्र IPS अधिकारियों का एक पैनल तैयार करेगा। राज्य सरकार को इस पैनल में से ही किसी एक की नियुक्ति करनी होगी।
- कार्यवाहक DGP पर रोक: सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः रेखांकित किया है कि कानून के तहत “कार्यवाहक DGP की कोई अवधारणा नहीं है”, और राज्यों को तदर्थ या कामचलाऊ आधार पर पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया है।
प्रकाश सिंह वाद (2006) के बारे में
- प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ वाद पुलिस सुधारों की दिशा में एक युगांतरकारी क्षण है। इसकी शुरुआत एक जनहित याचिका (PIL) से हुई थी, जिसका उद्देश्य पुलिस व्यवस्था पर राजनीतिक नियंत्रण को कम करने और पेशेवर स्वायत्तता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थित पुलिस सुधार करना था।
- निर्देश 1: जाँच और कानून-व्यवस्था कार्यों का पृथक्करण:
- न्यायालय ने कानून और व्यवस्था (एक कार्यकारी कार्य) तथा अपराधिक जाँच (आपराधिक न्याय प्रणाली का एक हिस्सा) से संबंधित पुलिस कार्यों को पृथक करने की अनुशंसा की।
- निर्देश 2: DGP की नियुक्ति:
- यह सुनिश्चित करना कि DGP की नियुक्ति एक पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से हो और उनका न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष का हो।
- राज्य सरकारों को पदस्थ अधिकारी की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले DGP की नियुक्ति के प्रस्ताव संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजने होंगे।
- UPSC, राज्य सरकार के परामर्श से, तीन पात्र पुलिस अधिकारियों की एक सूची तैयार करता है। इसके बाद राज्य सरकार इन्हीं अधिकारियों में से किसी एक को DGP के रूप में नियुक्त करती है।
- निर्देश 3: पुलिस अधिकारियों के लिए न्यूनतम कार्यकाल:
- यह सुनिश्चित करना कि परिचालन संबंधी कर्तव्यों पर तैनात अन्य पुलिस अधिकारियों (एक जिले के प्रभारी पुलिस अधीक्षक – SP और पुलिस स्टेशन के प्रभारी थानाध्यक्ष – SHO सहित) का भी कार्यकाल न्यूनतम दो वर्ष हो।
- निर्देश 4: राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना (SSC) ताकि:
- यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य सरकार पुलिस पर अनुचित प्रभाव या दबाव न डाला जाए।
- व्यापक नीतिगत दिशा-निर्देश निर्धारित किए जाएं।
- राज्य पुलिस के कार्य-प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा सके।
- निर्देश 5: पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन:
- इसका उद्देश्य पुलिस उपाधीक्षक (DSP) और उससे कम रैंक के पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण, पदोन्नति, तैनाती और अन्य सेवा संबंधी मामलों का निर्णय लेना है। साथ ही, यह बोर्ड DSP के पद से ऊपर के अधिकारियों की तैनाती और स्थानांतरण पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करता है।
- निर्देश 6: पुलिस शिकायत प्राधिकरण (PCA) की स्थापना:
- राज्य स्तर पर, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) और उससे ऊपर के रैंक के पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध गंभीर कदाचार के मामलों में सार्वजनिक शिकायतों की जाँच करना, जिसमें हिरासत में मृत्यु, घोर उपहति या पुलिस हिरासत में बलात्कार शामिल हैं।
- जिला स्तर पर, गंभीर कदाचार के मामलों में पुलिस उपाधीक्षक (DSP) के पद से नीचे के पुलिस कर्मियों के विरुद्ध सार्वजनिक शिकायतों की जाँच करना।
- निर्देश 7: केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन:
- इसका उद्देश्य केंद्रीय पुलिस संगठनों (CPO) के प्रमुखों के चयन और नियुक्ति के लिए एक पैनल तैयार करना है, जिनका न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष का सुनिश्चित किया जाए।
पुलिस आयोग पर विभिन्न समितियां /आयोग
- राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977): मोरारजी देसाई सरकार के अधीन गठित इस आयोग ने पुलिस बल की दक्षता में सुधार करने और पेशेवर रुख अपनाने के उपायों की अनुशंसा की थी।
- पुलिस सुधारों पर रिबेरो समिति (1998): राष्ट्रीय पुलिस आयोग (NPC) की सिफारिशों के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त इस समिति ने राज्यों में ‘पुलिस प्रदर्शन और जवाबदेही आयोग’ तथा ‘जिला शिकायत प्राधिकरण’ के गठन की सिफारिश की थी।
- पुलिस सुधारों पर पद्मनाभैया समिति (2000): समिति ने सिफारिश की थी कि कांस्टेबल और उप-निरीक्षक का चयन प्रारंभिक अर्हता स्क्रीनिंग टेस्ट पर आधारित होना चाहिए।
- आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारों पर मलिमथ समिति (2003): इसने जाँच कार्य को कानून-व्यवस्था के कार्यों से अलग करने, फोरेंसिक विज्ञान क्षमताओं को बढ़ाने और ‘प्ली बारगेनिंग’ (plea bargaining) की प्रणाली शुरू करने की सिफारिश की थी।
- मूशाहारी समिति (2004): इसने पुलिस कर्मियों की भर्ती के लिए एक चयन बोर्ड के गठन (जिसकी अध्यक्षता DIG करें और SP उनकी सहायता करें), कांस्टेबलों के वेतनमान और कार्य के घंटों में संशोधन, तथा कांस्टेबलों के लिए पदोन्नति की संभावनाओं में सुधार की सिफारिश की थी।
