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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले देशों (LBCs) के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) दिशा-निर्देशों में संशोधनों को अनुमोदित किया, ताकि रणनीतिक और स्वामित्व हितों की रक्षा करते हुए निवेश प्रतिबंधों में ढील दी जा सके।

अन्य संबंधित जानकारी

• यह निर्णय प्रेस नोट 3 (2020) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों में संशोधिन करता है, जिसके अंतर्गत ऐसे देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी अनुमोदन लेना अनिवार्य था।

  • 2020 में जारी प्रेस नोट 3 में यह विनिर्दिष्ट किया गया था कि भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले किसी भी देश की कोई भी इकाई केवल सरकारी अनुमति प्राप्त करने के पश्चात ही भारत में निवेश कर सकती है। इससे पूर्व, यह नियम केवल बांग्लादेश और पाकिस्तान की इकाइयों पर लागू होता था। 2020 के नियम ने इसका विस्तार भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले अन्य देशों, विशेष रूप से चीन तक कर दिया था।

• यह संशोधन एक हितकारी स्वामित्व फ्रेमवर्क की शुरुआत करता है और पड़ोसी देशों से होने वाले कतिपय गैर-नियंत्रणकारी निवेशों के लिए प्रतिबंधों में छूट देता है।

• सरकार ने चयनित विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश के लिए एक द्रुत अनुमोदन तंत्र की भी घोषणा की है।

• इस सुधार का उद्देश्य भारतीय कंपनियों के स्वामित्व और नियंत्रण पर सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करते हुए उच्च पूंजी प्रवाह को आकर्षित करना है।

दिशानिर्देशों में प्रमुख परिवर्तन

• हितकारी स्वामित्व (Beneficial Ownership) की परिभाषा: इस संशोधन में धन शोधन निवारण नियम, 2005 के प्रावधानों के आधार पर ‘हितकारी स्वामित्व’ के निर्धारण के लिए एक औपचारिक परिभाषा और मानदंड शामिल किए गए हैं।

• हितकारी स्वामित्व परीक्षण का अनुप्रयोग: निवेश के वास्तविक स्वामी की पहचान करने के लिए निवेशक इकाई के स्तर पर ‘हितकारी स्वामित्व परीक्षण’ लागू किया जाएगा।

• सीमित गैर-नियंत्रणकारी निवेशों के लिए स्वचालित मार्ग: सरकार सीमावर्ती देशों के उन निवेशकों को 10% तक के गैर-नियंत्रणकारी हितकारी स्वामित्व के साथ स्वचालित मार्ग के माध्यम से निवेश करने की अनुमति देती है।

• विद्यमान FDI शर्तों का अनुपालन: निवेश को मौजूदा क्षेत्रीय सीमाओं, प्रवेश मार्गों और अन्य लागू शर्तों का अनुपालन करना होगा।

• अनिवार्य रिपोर्टिंग आवश्यकता: निवेश प्राप्त करने वाली कंपनी निवेश से संबंधित सभी प्रासंगिक विवरण उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) को रिपोर्ट करेगी।

• समयबद्ध अनुमोदन तंत्र: सरकार चयनित विनिर्माण क्षेत्रों में सीमावर्ती देशों से प्राप्त निवेश प्रस्तावों को 60 दिनों की समय सीमा के भीतर संसाधित करेगी।

• रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों का कवरेज: इन क्षेत्रों में पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक घटकों, पॉलीसिलिकॉन और इंगोट-वेफर का विनिर्माण शामिल है।

• क्षेत्रीय संशोधन की गुंजाइश: कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की समिति (CoS) आवश्यकता पड़ने पर विनिर्दिष्ट क्षेत्रों की सूची में संशोधन कर सकती है।

• भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण को बनाए रखना: दिशानिर्देश यह अनिवार्य करते हैं कि निवेश प्राप्त करने वाली कंपनी की बहुलांश हिस्सेदारी और प्रभावी नियंत्रण निवासी भारतीय नागरिकों या उनके स्वामित्व और नियंत्रण वाली भारतीय इकाइयों के पास ही रहेगा।

संशोधनों का महत्व

• यह सुधार वैश्विक निवेशकों को नियामक स्पष्टता प्रदान करता है, जिसमें निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंड शामिल हैं, जिनका पड़ोसी देशों के निवेशकों के साथ आंशिक संबंध हो सकता है।

• निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाकर और एक निश्चित अनुमोदन समय-सीमा निर्धारित करके, इस परिवर्तन से व्यवसाय सुगमता में सुधार होने की गुंजाइश है।

• यह नीति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए स्टार्टअप, डीप-टेक और विनिर्माण क्षेत्रों के लिए उच्चतर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अंतर्वाह का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

• यह सुधार प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संयुक्त उद्यमों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारतीय कंपनियों के गहन एकीकरण की सुविधा प्रदान कर सकता है।

• इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत घटकों के क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करना है।

• यह नीति महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीयों का स्वामित्व और नियंत्रण सुनिश्चित करके रणनीतिक सुरक्षा उपायों के साथ आर्थिक खुलेपन को संतुलित करती है।

Source:
The Hindu
PM India
PIB

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