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सामान्य अध्ययन-2: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, गठन और कार्यप्रणाली, व्संविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय।

संदर्भ: 13 जनवरी, 2026 को उच्चतम न्यायालय ने ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988’ की धारा 17A पर एक खंडित निर्णय दिया। उल्लेखनीय है कि इस धारा के अनुसार, लोक सेवकों के विरुद्ध जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व-अनुमोदन अनिवार्य है।

अन्य संबंधित जानकारी:

  • यह निर्णय ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (CPIL) द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर दिया गया है, जिसमें धारा 17A को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह प्रावधान असंवैधानिक, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।
  • न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना वाली एक दो सदस्यीय पीठ ने इस पर अपने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए।
  • अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को संदर्भित किया जाएगा ताकि इसे तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा जा सके।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 17A पर पीठ का निर्णय:

  • धारा 17A को निरस्त करने के पक्ष में:
    • संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: न्यायमूर्ति नागरत्ना ने माना कि धारा 17A अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह केवल उच्च पदस्थ लोक सेवकों को पूर्व-अनुमोदन का संरक्षण प्रदान करती है।
      • समानता का उल्लंघन: कर्तव्यों की प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण अवैध है और ‘विधि के शासन’ के सिद्धांत के विरुद्ध है।
      • नए स्वरूप में पुराना कानून: धारा 17A, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम की धारा 6A का ही प्रतिबिंब है।
      • प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी कार्यवाही में बाधा: धारा 17A के तहत अनुमोदन प्रदान करने की प्रक्रिया निष्पक्षता, तटस्थता और वस्तुनिष्ठता की कमी के कारण कमजोर पड़ती है।
  • 17A of PCA की धारा 17A को निरस्त करने के विपक्ष में:
    • संरक्षण का आधार: न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने इस बात पर बल दिया कि ईमानदार अधिकारियों को निराधार जांच से बचाने के लिए कुछ सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
    • नीतिगत पंगुता का जोखिम: धारा 17A को पूरी तरह से अमान्य करने से ईमानदार लोक सेवक दमनकारी और तुच्छ आपराधिक प्रक्रियाओं के शिकार हो सकते हैं।
      • इसके परिणामस्वरूप, लोक सेवक प्ले-इट-सेफ‘ (सुरक्षित खेल) सिंड्रोम का सहारा लेंगे, जिससे नीतिगत पंगुता की स्थिति उत्पन्न होगी।
  • अनुशंसित सुरक्षा तंत्र:
    • संरक्षण और जवाबदेही में संतुलन: पूर्व अनुमोदन केवल कार्यकारी मंजूरी के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र निकायों के माध्यम से प्राप्त किया जाना चाहिए।
    • कार्यकारी हस्तक्षेप में कटौती: धारा 17A के तहत मंजूरी का निर्णय कार्यपालिका से स्वतंत्र एजेंसी जैसे-केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त द्वारा लिया जाना चाहिए।
      • हालांकि, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि यह अस्वीकार्य न्यायिक विधानहोगा, क्योंकि कानून में अनुमोदन की शक्ति स्पष्ट रूप से कार्यपालिका को सौंपी गई है।

पूर्व अनुमोदन पर पिछले निर्णय और समितियों की सिफारिशें:

  • विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997): उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार के 1969 के “एकल निर्देश” को निरस्त कर दिया था।
    • एकल निर्देश में यह उल्लेख किया गया था कि सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और राष्ट्रीयकृत बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध जांच शुरू करने के लिए नामित प्राधिकारी का पूर्व अनुमोदन अनिवार्य होगा|
  • सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2014): न्यायालय ने DSPE अधिनियम की धारा 6A को निरस्त करते हुए कहा कि यह केवल लोक सेवकों के एक वर्ग को संरक्षण देकर समानता के मानदंड का उल्लंघन करती है।
    • धारा 6A को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) अधिनियम, 2003 की धारा 26(c) के माध्यम से DSPE अधिनियम, 1946 में जोड़ा गया था, ताकि पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता को पुन: बहाल किया जा सके।
  • राज्यसभा चयन समिति (2016): जब भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) विधेयक, 2017 (जो बाद में 2018 का संशोधन बना और जिसके द्वारा धारा 17A को जोड़ा गया) की समीक्षा की गई, तब चयन समिति ने धारा 17A को शामिल करने का समर्थन किया और यह सिफारिश की कि पूछताछ/जांच के लिए पूर्व अनुमोदन की शक्ति किसी स्वतंत्र निकाय के बजाय केंद्र/राज्य सरकार में ही निहित होनी चाहिए।
  • संथानम समिति (1962): हालाँकि यह प्रत्यक्ष रूप से धारा 17A से संबंधित नहीं थी, समिति ने नियमित कार्यकारी नियंत्रण से स्वतंत्र भ्रष्टाचार जांच की निगरानी के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की स्थापना की सिफारिश की थी।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 की धारा 17A क्या है?

  • इसे 2018 में एक संशोधन के माध्यम से पेश किया गया था।
  • उद्देश्य: यह अनिवार्य करता है कि कोई भी पुलिस अधिकारी सक्षम प्राधिकारी की “पूर्व अनुमति” के बिना किसी लोक सेवक द्वारा किए गए कथित अपराध की कोई पूछताछ, जांच या छान-बीन नहीं करेगा।
    • यह वहाँ लागू होता है जहाँ आरोप लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में ली गई किसी सिफारिश या निर्णय से संबंधित हो।
  • अनुमोदन प्राधिकारी: लोक सेवक के कैडर के आधार पर, अनुमोदन केंद्र सरकार, राज्य सरकार या जिस प्राधिकारी को उस अधिकारी को हटाने की शक्ति है, उसी से प्राप्त करना होता है।
  • अनुमोदन की अवधि: प्रावधान अनुमोदन देने या अस्वीकार करने के लिए तीन महीने की समय सीमा निर्धारित करता है, जिसे दर्ज कारणों के साथ एक अतिरिक्त महीने तक बढ़ाया जा सकता है।
  • छूट: यह “ट्रैप मामलों” (रंगे हाथ पकड़ना) में लागू नहीं होता है, जहाँ लोक सेवक को अनुचित लाभ स्वीकार करते हुए पकड़ा जाता है।
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