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सामान्य अध्ययन-2: स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास से संबंधित विषय।

संदर्भ: हाल ही में, भारत में महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता से संबंधित एक  महत्वपूर्ण निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने एक नाबालिग के 30 सप्ताह के गर्भ के चिकित्सा गर्भपात की अनुमति दी। दरअसल, नाबालिक के गर्भ ने चिकित्सा गर्भपात (MTP) अधिनियम, 1971 के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की समय-सीमा को पार कर लिया था।

अन्य संबंधित जानकारी

  • उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि प्रतिस्पर्धी हितों पर गर्भवती महिला की प्रजनन स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसमें विकसित-गर्भावस्था (Advanced-gestation) के मामले भी शामिल हैं।
    • प्रजनन स्वायत्तता से तात्पर्य बिना किसी जबरदस्ती या भेदभाव के कब, कैसे और कितने बच्चों को जन्म देना है, इसके बारे में सूचित और स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार से है।
  • न्यायालय ने पाया कि एक बार यदि गर्भावस्था, चिकित्सा अधिनियम 1971 के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की समय-सीमा को पार कर जाती है, तो महिलाओं को असुरक्षित और गैर-कानूनी गर्भपात के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।
  • निर्णय में गर्भपात कानूनों के प्रति अधिक मानवीय, लचीला और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया जो महिलाओं की सुरक्षा और स्वायत्तता को प्राथमिकता देता हो।

गर्भपात क्या है?

  • गर्भपात से आशय भ्रूण की ‘जीवनक्षमता’ प्राप्त करने से पूर्व, विधिक गर्भावधि सीमाओं और चिकित्सीय परामर्श के अधीन, औषधीय अथवा शल्य प्रक्रियाओं के माध्यम से गर्भावस्था के स्वैच्छिक समापन से है।
  • गर्भपात एक संवेदनशील विषय है और अक्सर चर्चा में रहता है। इसके बारे में लोगों की राज्य उनके मूल्यों, विश्वासों, धर्म और कानून के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है।

भारत में गर्भपात के लिए कानूनी प्रावधान

  • 1960 के दशक तक, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 312 के तहत गर्भपात कराना गैर-कानूनी था, बजाय इसके कि यह महिला की जान बचाने के अच्छे इरादे से किया गया हो।
  • शांतिलाल शाह समिति ने इस मुद्दे की जांच की और कानून के उदारीकरण की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की अनुमति देने के लिए चिकित्सा गर्भपात अधिनियम, 1971 लागू किया गया।
  • यद्यपि MTP अधिनियम में कानूनी गर्भपात के लिए एक समय-सीमा तय की गई है, उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता, गरिमा और स्वास्थ्य का हवाला देते हुए, असाधारण परिस्थितियों में (गैर-सहमति वाले वैवाहिक संभोग से किए गए गर्भधारण सहित) इन सीमाओं से परे गर्भपात की अनुमति दी है।
    • ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी मामले (2017) में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रजनन संबंधी विकल्प चुनना अनुच्छेद 21 के तहत महिला के जीवन के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता का हिस्सा है।
  • गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994 के तहत लिंग-चयनात्मक गर्भपात गैर-कानूनी है।

चिकित्सा गर्भपात (MTP) अधिनियम, 1971

  • MTP अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, गर्भधारण के 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था का समापन एक पंजीकृत चिकित्सक की सलाह पर किया जा सकता है।
  • 20 से 24 सप्ताह के बीच की गर्भावस्था के मामले में, गर्भपात की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब दो पंजीकृत चिकित्सक इसके लिए अपनी राय दें।
  • MTP अधिनियम के तहत बनाए गए MTP नियमों के नियम 3B के अनुसार, कुछ श्रेणियों के लिए 20 से 24 सप्ताह के बीच भी गर्भपात कराने की अनुमति है, जिनमें यौन शोषण या बलात्कार की शिकार महिलाएं, नाबालिग, गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक स्थिति में बदलाव, शारीरिक विकलांगता या मानसिक बीमारी वाली महिलाएं शामिल हैं।
  • 24 सप्ताह के बाद, MTP अधिनियम के तहत प्रत्येक जिले में राज्य सरकार को विशेषज्ञ डॉक्टरों का मेडिकल बोर्ड गठित करना होगा है, जो गंभीर भ्रूण विकृति के मामले में गर्भपात की अनुमति देने के संबंध में अपनी राय देते हैं।

MTP संशोधन अधिनियम, 2021

  • गर्भावधि सीमा: विशेष श्रेणियों (बलात्कार पीड़ित, नाबालिग आदि) के लिए बढ़ाकर 24 सप्ताह की गई।
  • चिकित्सकीय परामर्श: 20 सप्ताह तक के गर्भपात के लिए एक चिकित्सक और 20-24 सप्ताह के लिए दो चिकित्सकों से परामर्श लेना अनिवार्य है।
  • अविवाहित महिलाएं: जब गर्भनिरोधक दवाएं प्रभावी न हो तो ऐसी स्थिति में गर्भपात की अनुमति है।
  • मेडिकल बोर्ड: गंभीर भ्रूण विकृतियों के लिए 24 सप्ताह से अधिक के मामलों की समीक्षा करना।
  • गोपनीयता: रोगी की पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए।

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