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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: हाल ही में, भारत सरकार ने लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting – FIT) फ्रेमवर्क के तहत व्यापक आर्थिक स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए, अगले पाँच वर्षों (2026-2031) के लिए 4% (±2%) के मुद्रास्फीति लक्ष्य को बरकरार रखा है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZA के तहत, सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक के परामर्श से 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 की अवधि के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्य को आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया।
  • यह उसी लक्ष्य का लगातार दूसरा विस्तार है, जिसे पहली बार 2016 में पेश किया गया था और 2021 में नवीनीकृत किया गया था। यह सुदृढ़ नीतिगत निरंतरता को दर्शाता है।
  • हाल के आंकड़े बताते हैं कि मुद्रास्फीति व्यापक रूप से नियंत्रण में है; फरवरी 2026 में हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Headline CPI) मुद्रास्फीति 3.21% रही। इसमें खाद्य कीमतों में कमी और स्थिर समष्टि आर्थिक स्थितियों ने योगदान दिया।

भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के बारे में

  • मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को नीतिगत निर्णयों के एक ऐसे ढांचे के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें केंद्रीय बैंक एक निश्चित समय सीमा के भीतर सार्वजनिक रूप से घोषित संख्यात्मक मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नीति संचालन हेतु एक सुस्पष्ट प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
  • मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क समझौता:
  • भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक ने फरवरी 2015 में एक मौद्रिक नीति रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसका प्राथमिक उद्देश्य संवृद्धि के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।
  • सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक के परामर्श से मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित किया, जिसमें प्रत्येक पाँच वर्ष के पश्चात इसकी पुनः समीक्षा करने की संभावना है।
  • लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) का वैधानिक अंगीकरण
  • मई 2016 में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अधिनियम, 1934 में संशोधन किया गया ताकि भारत में ‘लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण’ (FIT) ढांचे के कार्यान्वयन को एक वैधानिक आधार प्रदान किया जा सके। यह भारत में ‘नियम-आधारित मौद्रिक नीति शासन’ की ओर एक बड़े बदलाव का प्रतीक था।
  • FIT के अंतर्गत, RBI उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति (जिसे ‘हेडलाइन मुद्रास्फीति’ भी कहा जाता है) को 4% पर बनाए रखने का लक्ष्य रखता है। इसमें ±2 प्रतिशत अंक की ‘सहिष्णुता सीमा’ निर्धारित है, अर्थात लक्ष्य की सीमा 2% से 6% के बीच है।
  • यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक 6% से अधिक रहती है या 2% से नीचे गिर जाती है, तो इसे लक्ष्य प्राप्त करने में विफलता माना जाता है।
  • मौद्रिक नीति समिति इस मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नीतिगत रेपो दर का निर्धारण करती है और ‘लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण’ (FIT) ढांचे को क्रियान्वित करती है।
  • मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का वैश्विक अनुभव:
    • मौद्रिक नीति ढांचे के रूप में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को पहली बार 1990 में न्यूजीलैंड द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
    • वर्तमान में यह विश्व स्तर पर सबसे व्यापक रूप से अपनाया जाने वाला मौद्रिक नीति ढांचा बन गया है। विकसित और उभरती—दोनों ही प्रकार की अर्थव्यवस्थाएं मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को स्थिर (करने और नीतिगत विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए इसका उपयोग करती हैं।

लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) फ्रेमवर्क का प्रदर्शन

  • मुद्रास्फीति के परिणाम: औसत मुद्रास्फीति ‘पूर्व-FIT’ अवधि के लगभग 6.8% से घटकर ‘पश्च-FIT’ अवधि में लगभग 4.9% हो गई। इस दौरान मुद्रास्फीति मुख्य रूप से निर्धारित सीमा के भीतर और स्थिर बनी रही।
  • प्रदर्शन के चरण:  2016-2019 के दौरान मुद्रास्फीति 4% के आसपास निम्न और स्थिर रही।
    • 2020-2022 के दौरान वैश्विक झटकों के कारण मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर रही।
    • 2022 के पश्चात: मुद्रास्फीति पुनः निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप आ गई है।
  • कूबड़-नुमा मुद्रास्फीति पैटर्न: मुद्रास्फीति के प्रक्षेपवक्र ने एक ‘कूबड़-नुमा’ पैटर्न प्रदर्शित किया। इसके प्रारंभिक और हालिया वर्ष लक्ष्य के अनुरूप रहे, जबकि मध्यवर्ती वर्ष ऊपरी सहिष्णुता सीमा  की ओर झुके हुए थे।
  • देहलीज प्रभाव: लगभग 6% से अधिक की मुद्रास्फीति आर्थिक संवृद्धि में भारी गिरावट का कारण बनती है। यह तथ्य वर्तमान सहिष्णुता सीमा की उपयुक्तता की पुष्टि करता है।

मुद्रास्फीति नियंत्रण का महत्व

  • आर्थिक महत्व: उच्च मुद्रास्फीति एक प्रतिगामी कर के रूप में कार्य करती है जो निर्धन वर्ग को अधिक क्षति पहुँचाती है, बचतों को कम करती है और निवेशों का कुप्रबंधन करती है। इसके विपरीत, स्थिर मुद्रास्फीति पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करती है और दीर्घकालिक संवृद्धि का समर्थन करती है।
  • हेडलाइन बनाम कोर बहस: ‘कोर मुद्रास्फीति’ की तुलना में ‘हेडलाइन मुद्रास्फीति’ को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की टोकरी में खाद्य पदार्थों का भारांक अधिक है और मजदूरी तथा मांग पर इसके द्वितीय-चरण के प्रभाव पड़ते हैं।
  • सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि: मिल्टन फ्रीडमैन के अनुसार, मुद्रास्फीति “सदैव और सर्वत्र एक मौद्रिक परिघटना है” जो मुद्रा आपूर्ति के विस्तार से संचालित होती है। वहीं, फिलिप्स वक्र यह सुझाव देता है कि मुद्रास्फीति और संवृद्धि के बीच केवल अल्पकालिक ‘नीतिगत समझौता’ (Trade-off) होता है, दीर्घकाल में ऐसा कोई समझौता संभव नहीं है।
  • इष्टतम मुद्रास्फीति स्तर: अनुभवजन्य अनुमान इष्टतम मुद्रास्फीति स्तर को लगभग 4% (सटीक रूप से 3.98%) पर रखते हैं, जो लक्ष्य को 4% से ऊपर बढ़ाने के पक्ष में सीमित तर्क प्रदान करते हैं।
  • नीतिगत अंतर्संबंध: प्रभावी मुद्रास्फीति नियंत्रण ‘लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण’ (FIT) ढांचे के माध्यम से मौद्रिक अनुशासन और राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 के माध्यम से राजकोषीय अनुशासन पर निर्भर करता है; क्योंकि किसी एक की कमजोरी दूसरे के प्रभाव को समाप्त कर सकती है।

Sources:
The Hindu
The Hindu
Deccan Herald
Tribune India

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