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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

सामान्य अध्ययन-3:आपदा और आपदा प्रबंधन।

संदर्भ: ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा तैयार की गई भारत के बुनियादी ढांचे के लिए जलवायु जोखिम और बीमा” रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत में जलवायु प्रभाव अब दुर्लभ घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि उनकी आवृत्ति और गंभीरता दोनों में निरंतर वृद्धि हो रही है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:

• भारत के बुनियादी ढांचा व्यय में उछाल: बुनियादी ढांचे पर किया जाना वाला व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3 प्रतिशत से अधिक हो गया है।

• देश भर में जलवायु जोखिम: भारत में जलवायु प्रभाव अब छिटपुट घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि 2010 के दशक के मध्य से इनकी आवृत्ति और गंभीरता में तीव्र वृद्धि देखी गई है क्योंकि जोखिम कारकों में जल-मौसम संबंधी आपदाएँ (विशेष रूप से बाढ़) का अधिक प्रभाव दिखाई दे रहा है।

• उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विस्तार: 2025 में भारत के जलवायु प्रभाव कैलेंडर पर जल-मौसम संबंधी आपदाओं का वर्चस्व रहा। बाढ़, अत्यधिक वर्षा, चक्रवात और भूस्खलन ने पूंजी-गहन बुनियादी ढांचे को बार-बार प्रभावित किया।

• अत्यधिक जलवायु-प्रवण राज्य: असम, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख और पूर्वोत्तर के हिस्से सबसे अधिक जलवायु-सुभेद्य राज्यों में शामिल हैं, जबकि यहाँ बुनियादी ढांचे पर अधिक निवेश किया जाता है।

  • इन क्षेत्रों में लगभग ₹2.95 ट्रिलियन निवेश बुनियादी ढाँचे जिसमें बंदरगाह, सुरंगें, राजमार्ग और प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ शामिल हैं, को नुकसान होने का अनुमान है।

• बीमा अंतराल: हालांकि बीमाकर्ता बाढ़, चक्रवात, गर्मी और अत्यधिक वर्षा के लिए ‘पैरामीट्रिक’ और जलवायु-अनुकूल उत्पाद की पेशकश कर रहे हैं, लेकिन बादल फटने और भूस्खलन जैसे उच्च-प्रभाव वाले जोखिमों के लिए कवरेज का अभाव है जबकि ये जोखिम हिमालयी और तटीय क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे के लिए अत्यंत प्रासंगिक होते जा रहे हैं।

• बीमा क्षेत्र पर दबाव: सर्वेक्षण में शामिल सभी बीमाकर्ताओं ने कहा कि मौजूदा मॉडल उभरते जलवायु प्रभावों का आकलन करने के लिए अपर्याप्त हैं, जिससे आर्थिक नुकसान और बीमित कवरेज के बीच अंतर बढ़ने की संभावना है।

  • दो-तिहाई बीमाकर्ताओं ने 2015 से प्रीमियम में वृद्धि दर्ज की है, जबकि सभी उत्तरदाताओं ने बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, विशेष रूप से बाढ़ और भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में स्थित जलविद्युत संपत्तियों के लिए वहनीयता की चुनौतियों की ओर संकेत किया।

• सरकारों, बीमाकर्ताओं और निवेशकों के लिए बढ़ते वित्तीय जोखिम: बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और अत्यधिक गर्मी राजमार्गों, बंदरगाहों, शहरी संपत्तियों और जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से नुकसान पहुँचा रहे हैं। इससे बीमा प्रीमियम बढ़ रहा है और कुछ क्षेत्र ‘बीमा अयोग्यता की सीमा’ (Threshold of Uninsurability) के करीब पहुँच रहे हैं।

• IRDAI के लिए नियामक चुनौती: निष्कर्ष भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के समक्ष दोहरी चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं। प्राधिकरण एक ओर बीमाकर्ताओं को बीमा पैठ और कवरेज विस्तार हेतु प्रोत्साहित कर रहा है, तो दूसरी ओर उन्हें जलवायु परिवर्तन जैसे उभरते जोखिमों के समाधान हेतु नवाचारी उत्पाद विकसित करने के लिए भी प्रेरित कर रहा है

  • भारत की गैर-जीवन बीमा पैठ लगभग 1% बनी हुई है, जो वैश्विक स्तर से काफी कम है, जबकि जलवायु-संबंधी नुकसान में बढ़ोतरी हो रही है।

• वित्त मंत्रालय के लिए राजकोषीय निहितार्थ: जैसे-जैसे जलवायु जोखिम अधिक आवर्ती और पूर्वानुमेय होते जा रहे हैं, बीमा रहित या अल्प-बीमा वाले नुकसानों की क्षतिपूर्ति आपदा राहत, संपत्ति पुनर्निर्माण, व्यवहार्यता अंतराल वित्तपोषण  और सार्वजनिक गारंटी के माध्यम से होने की संभावना है। यह बढ़ती आकस्मिक देनदारियों के लिए चिंताएँ उत्पन्न करता है।

• बढ़ता वित्तीय बोझ: वैश्विक स्तर पर, वित्त वर्ष 2025 में बीमित संपत्ति का नुकसान $140 बिलियन से अधिक हो गया, जबकि 2023 में भारत का प्राकृतिक आपदा नुकसान $12 बिलियन तक पहुँच गया, जो पिछले दशक के औसत से काफी अधिक है। यह सार्वजनिक वित्त पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव के पैमाने को दर्शाता है।

रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें:

• लचीलापन-प्रथम नियोजन का आह्वान: जलवायु लचीलेपन को आपदा के उपरांत सुधार के बजाय शुरुआत से ही बुनियादी ढांचा नियोजन में एकीकृत किया जाना चाहिए, ताकि आपदा के बाद पुनर्निर्माण की लागत न्यूनतम हो।

• उन्नत बीमांकिक मॉडल: दीर्घकालिक बीमा व्यवहार्यता के लिए जोखिम प्रकटीकरण, प्रीमियम मूल्य निर्धारण और नुकसान के आकलन हेतु उन्नत बीमांकिक मॉडल और मानकीकृत ढांचे की आवश्यकता।

• जलवायु जोखिम के अनुरूप नियामक संरेखण और राजकोषीय नियोजन: जलवायु जोखिमों के अनुरूप राजकोषीय नियोजन की आवश्यकता है, ताकि बढ़ती बीमा अयोग्यता, उच्च परियोजना जोखिम प्रीमियम तथा निजी निवेश के प्रति हतोत्साहित करने वाली परिस्थितियों का समाधान किया जा सके। ये कारक संयुक्त रूप से भारत की बुनियादी ढांचा-केंद्रित विकास रणनीति के समक्ष जटिल चुनौतियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं।

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