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सामान्य अध्ययन-3: आपदा और आपदा प्रबंधन।
संदर्भ: भारत ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के माध्यम से आपदा पीड़ित पहचान (Disaster Victim Identification – DVI) के लिए देश के पहले दिशानिर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) जारी किए।
अन्य संबंधित जानकारी
- इन दिशानिर्देशों का लक्ष्य सामूहिक हताहत की घटनाओं के दौरान मानव अवशेषों की व्यवस्थित पहचान, पंजीकरण और परिवारों को गरिमापूर्ण तरीके से उन्हें सौंपना है।
- ये दिशानिर्देश बार-बार घटित हुई ऐसी घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप तैयार किए गए हैं, जिनमें आपदा पीड़ितों की पहचान नहीं हो पाती थी या उनकी पहचान करना अत्यंत कठिन होता था। इसके कारण प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक मानसिक पीड़ा से जूझना पड़ता था और कानूनी प्रक्रिया के पूरी होने एवं मुआवजे की राशि के वितरण में अत्यधिक विलंब होता था।
- यह फ्रेमवर्क पिछली आपदाओं के दौरान सामना की गई खंडित व्यवस्थाओं और समन्वय की विफलताओं को दूर करने के लिए, एकीकृत कमान संरचना के तहत विभिन्न फॉरेंसिक विधाओं को सम्मिलित करने का प्रयास करता है।
- इन दिशानिर्देशों में अहमदाबाद AI-171 विमान दुर्घटना के अनुभवों को भी समाहित किया गया है, जो फॉरेंसिक दंत विज्ञान और डीएनए (DNA) विश्लेषण के महत्व को रेखांकित करते हैं। साथ ही, ये एक राष्ट्रीय दंत डेटा रजिस्ट्री के निर्माण की आवश्यकता पर बल देते हैं।
- आपदा पीड़ित पहचान (DVI) के लिए स्वीकृत विधियों में फॉरेंसिक दंत विज्ञान, डीएनए विश्लेषण, फॉरेंसिक नर्सिंग, पोस्टमार्टम फिंगरप्रिंटिंग, मानवीय फॉरेंसिक विज्ञान, वर्चुअल ऑटोप्सी और फॉरेंसिक पुरातत्व शामिल हैं।
आपदा पीड़ित पहचान(DVI)के बारे में
- आपदा पीड़ित पहचान (DVI) एक व्यवस्थित, बहु-विषयक, मेडिको-लीगल (medico-legal) और मानवीय प्रक्रिया है, जिसका उपयोग सामूहिक हताहत की घटनाओं के उपरांत मृत व्यक्तियों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
- यह वैज्ञानिक रूप से मान्य पहचानकर्ताओं पर निर्भर करती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों विशेष रूप से इंटरपोल (Interpol) द्वारा निर्धारित मानकों का पालन करती है।
राष्ट्रीय डेंटल डेटा रजिस्ट्री
- इंटरपोल DVI दिशानिर्देशों (2023) के अनुसार, फिंगरप्रिंट, दंत परीक्षण (फॉरेंसिक दंत विज्ञान) और डीएनए प्रोफाइलिंग तीन प्राथमिक वैज्ञानिक पहचानकर्ता हैं; जबकि टैटू, निशान और आभूषणों को द्वितीयक तथा कम विश्वसनीय माना जाता है।
- अहमदाबाद में AI-171 विमान दुर्घटना के दौरान, लगभग 260 झुलसे हुए और मिले-जुले शवों की पहचान पारंपरिक तरीकों जैसे दृश्य पहचान या फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से करना संभव नहीं था।
- अधिकारियों ने उनकी पहचान करने के लिए मुख्य रूप से इंटरपोल मानकों के अनुरूप फॉरेंसिक दंत विज्ञान और डीएनए विश्लेषण पर विश्वास किया।
- इस अनुभव से सीख लेते हुए, NDMA के दिशानिर्देश भविष्य की आपदाओं के दौरान मृत्यु से पूर्व और मृत्यु के बाद दंत डेटा की व्यवस्थित तुलना करने में सहायता हेतु एक राष्ट्रीय दंत डेटा रजिस्ट्री (National Dental Data Registry) बनाने की सिफारिश करते हैं।
DVI प्रक्रिया के चार चरण
- ये दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से हितधारकों की भूमिकाओं को परिभाषित करते हैं और पहचान प्रक्रिया के चार चरणीय प्रबंधन हेतु एक ‘एकीकृत DVI कमान’ की आवश्यकता पर बल देते हैं:
- घटना स्थल: आपदा स्थल से उचित दस्तावेजीकरण, टैगिंग, मैपिंग और संरक्षण के साथ मानव अवशेषों की व्यवस्थित रिकवरी।
- मृत्यु के बाद (पोस्टमार्टम) डेटा संग्रहण: चिकित्सीय-विधिक परीक्षण और फॉरेंसिक दस्तावेजीकरण, जिसमें फिंगरप्रिंट, डीएनए नमूनाकरण, दंत परीक्षण और वर्चुअल ऑटोप्सी शामिल हैं।
- मृत्यु से पूर्व डेटा संग्रहण: परिवारों और संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत, चिकित्सा एवं दंत रिकॉर्ड, फोटोग्राफ और परिवार तथा संबंधित लोगों के डीएनए नमूनों का संग्रहण।
- मिलान: पहचान की पुष्टि, मृत्यु के प्रमाणीकरण और परिवारों को अवशेषों की गरिमापूर्ण सुपुर्दगी हेतु मृत्यु से पूर्व और मृत्यु के बाद आंकड़ों की वैज्ञानिक तुलना।

अनुशंसित DVI तकनीकें
- दिशानिर्देश आपदा की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित आपदा पीड़ित पहचान (DVI) तकनीकों की अनुशंसा करते हैं:
- मृत्यु के बाद फिंगर प्रिंटिंग
- डीएनए जाँच
- फॉरेंसिक दंत विज्ञान
- वर्चुअल ऑटोप्सी
- फॉरेंसिक पुरातत्व (मुख्यतः भूस्खलन, इमारतों के गिरने और जले हुए अवशेषों के लिए)
वैज्ञानिक पहचान मानक
- पहचान की प्रक्रिया वैज्ञानिक और सत्यापन योग्य मानकों पर आधारित होनी चाहिए, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- बायोमीट्रिक्स
- प्रामाणिक दस्तावेज़
- इंटरपोल के मानदंडों के अनुरूप फोरेंसिक पहचान विधियाँ
प्रमुख चुनौतियां
- दिशानिर्देश भारत के वर्तमान आपदा पीड़ित पहचान (DVI) फ्रेमवर्क में प्रमुख परिचालन और संस्थागत चुनौतियों को स्वीकार करते हैं:
- अंतर-एजेंसी समन्वय के लिए एक सेवारत ‘DVI घटना कमांडर’ की अनुपस्थिति।
- मृत्यु से से पूर्व डेटा के संग्रहण हेतु मानकीकृत प्रणाली का अभाव।
- प्रशिक्षित फॉरेंसिक विशेषज्ञों की कमी और अत्यधिक कार्यभार वाली फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ।
- टैगिंग, मैपिंग और अभिरक्षा की श्रृंखला (chain-of-custody) के पालन में असंगतता, जिससे पहचान में त्रुटि और विधिक जोखिमों में वृद्धि होती है।
- मृत्यु घोषणा की जटिल प्रक्रिया और बहु-विषयक दृष्टिकोण का अभाव, जिसके कारण मुआवजे और विधिक प्रक्रिया के संपन्न होने में अधिक समय लगता है।
- फॉरेंसिक DVI हितधारकों सहित आपातकालीन प्रतिक्रियाकर्ताओं का अपर्याप्त या विलंबित परिनियोजन।
Source:
Indian Express
NDMA
