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सामान्य अध्ययन-1: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक एक कला, साहित्य और वास्तुकला के विभिन्न पहलू शामिल होंगे।

संदर्भ: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा बिहार के बलिराजगढ़ (मधुबनी जिला) में पांचवें दौर के उत्खनन की शुरुआत कर दी गई है। यह स्थल प्राचीन मिथिला का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस उत्खनन का मुख्य उद्देश्य प्रारंभिक नगरीय सभ्यता के साक्ष्यों को उजागर करना और इसकी प्राचीनता का वैज्ञानिक सत्यापन करना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • बलिराजगढ़ में अब तक कई बार उत्खनन (1962–63, 1972–73, 1974–75, 2013–14) किया जा चुका है, और वर्तमान प्रयासों का लक्ष्य उच्च भूजल स्तर जैसी पिछली बाधाओं को दूर करना है।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने पाँच सांस्कृतिक चरणों—मौर्य (NBPW), शुंग, कुषाण, गुप्त और पाल—के अध्ययन हेतु आधुनिक उपकरणों (उपग्रह मानचित्रण, व्यवस्थित सर्वेक्षण) का उपयोग करते हुए लगभग 20 खाइयों के उत्खनन की योजना बनाई है।
  • पूर्ववर्ती खोजों में उत्तरी काले चमकीले मृदभांड (NBPW), लगभग 2200 वर्ष पुरानी 10 फीट चौड़ी सुरक्षा दीवार, मनके, तांबे की वस्तुएं, मिट्टी की कलाकृतियाँ और आहत सिक्के शामिल हैं, जो उन्नत शहरी नियोजन और प्रारंभिक ऐतिहासिक से प्रारंभिक मध्यकालीन काल तक निरंतर निवास का संकेत देते हैं।
  • प्रारंभिक साक्ष्य बताते हैं कि यह स्थल लौह युग के विदेह साम्राज्य से संबंधित हो सकता है, अतः इस क्षेत्र का इतिहास संभावित रूप से कई शताब्दियों पुराना होगा।

बलिराजगढ़ किले के बारे में

  • बलिराजगढ़, बिहार के मधुबनी जिले में स्थित एक विशाल किलेबंद पुरातात्विक स्थल है, जो 120–176 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। स्थानीय स्तर पर इसे ‘राजा बलि का गढ़’ के नाम से जाना जाता है।
  • इस स्थल की पहचान सर्वप्रथम 1884 में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा की गई थी और 1938 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इसे एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया।
  • यह स्थल पौराणिक राजा बलि से संबद्ध है और विद्वानों द्वारा इसे विदेह साम्राज्य का एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र माना जाता है।
  • पुरातात्विक साक्ष्य यहाँ पाँच-स्तरीय सांस्कृतिक अनुक्रम को दर्शाते हैं:
    • NBPW (लगभग 700–200 ईसा पूर्व) → शुंग → कुषाण → गुप्त → पाल।
  • यह प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक मध्यकाल तक निरंतरता  का संकेत देता है।
  • यहाँ की सुरक्षा दीवारें और कलाकृतियों की विविधता एक सुनियोजित शहरी बसावट को दर्शाती हैं।

विदेह साम्राज्य/ मिथिला के बारे में

  • मिथिला, उत्तर वैदिक काल (लगभग 8वीं-6वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के 16 महाजनपदों में से एक, विदेह साम्राज्य की प्राचीन राजधानी थी।
  • भौगोलिक रूप से, यह पूर्वी गंगा के मैदानी इलाकों में स्थित था, जिसमें वर्तमान उत्तरी बिहार और नेपाल के कुछ हिस्से शामिल थे; सामान्यतः इसकी पहचान जनकपुर से की जाती है।
  • यह साम्राज्य बाद में वज्जी संघ (एक गणतांत्रिक गण-संघ) का हिस्सा बना, जो कुलीनतंत्रीय शासन के प्रारंभिक स्वरूप को दर्शाता है।
  • मिथिला पौराणिक और सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से रची-बसी है, जो जनक वंश और रामायण से संबद्ध है। यहाँ राजा जनक (सीता के पिता) धर्म और दार्शनिक ज्ञान के आदर्शों के प्रतीक हैं।
  • यह वैदिक शिक्षा और बौद्धिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था, जिससे गौतम बुद्ध, महावीर और याज्ञवल्क्य जैसी विभूतियाँ जुड़ी हुई है।
  • इस क्षेत्र ने शास्त्रीय परंपराओं, दर्शन, भाषा (मैथिली) और मधुबनी पेंटिंग जैसी कला विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे एक सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता अक्षुण्ण रही।
  • राजनीतिक रूप से, विदेह को बाद में मगध द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया था, फिर भी मिथिला सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं का एक स्थायी केंद्र बनी रही।

Sources :
Indian Express
Indian Express
The Hindu
Research Gate

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