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सामान्य अध्ययन-1: विश्व के भौतिक भूगोल की मुख्य विशेषताएँ।

संदर्भ: मध्य भारत के झील अवसादों के परागकण (Pollen) विश्लेषण पर आधारित एक पुरा-जलवायु अध्ययन से यह उजागर हुआ है कि मध्यकालीन जलवायु विसंगति के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून अधिक प्रबल था।

अन्य संबंधित जानकारी

  • वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित राजा रानी झील से 40 सेंटीमीटर लम्वे अवसाद कोर का निष्कर्षण करके 1060 और 1725 ईस्वी के मध्य तीव्र भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा के साक्ष्यों की खोज की है।
  • उत्तर होलोसीन (मेघालयन युग) मानसून में उल्लेखनीय परिवर्तनशीलता का काल रहा। इससे संबंधित यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP), लखनऊ के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था।
    • मेघालयन युग होलोसीन कल्प का सबसे नवीनतम चरण है, जो वर्तमान से लगभग 4,200 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था। इसे वर्ष 2018 में ‘इंटरनेशनल कमीशन ऑन स्ट्रेटिग्राफी’ (ICS) द्वारा आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई थी।
  • ये निष्कर्ष ‘रिव्यू ऑफ पेलियोबॉटनी एंड पेलिनोलॉजी’ नामक शोध जर्नल के जनवरी अंक में प्रकाशित हुए थे।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • अतीत में अधिक शक्तिशाली मानसून: पराग अभिलेख यह संकेत देते हैं कि लगभग 1060 ईस्वी और 1725 ईस्वी के बीच विशेष रूप से मध्यकालीन जलवायु विसंगति (MCA) की अवधि के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISM) बहुत अधिक शक्तिशाली था।
    • मध्यकालीन जलवायु विसंगति (MCA), जिसे ‘मध्यकालीन उष्ण काल’ भी कहा जाता है, लगभग 950 और 1250 ईस्वी के बीच का जलवायु चरण था, जब विश्व के कई हिस्सों में औसत से अधिक गर्म तापमान के साथ-साथ वर्षा के पैटर्न में भी क्षेत्रीय परिवर्तन अनुभव किए गए थे।
  • अतीत की वनस्पतियों का पुनर्निर्माण: मध्यकालीन जलवायु विसंगति (MCA) के दौरान, पराग अभिलेख (Pollen record) स्पष्ट रूप से आर्द्र और शुष्क उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन प्रजातियों की प्रधानता दर्शाते हैं। यह मध्य भारत में शक्तिशाली मानसूनी वर्षा और एक गर्म एवं आर्द्र जलवायु का संकेत देता है।
  • शुष्क अवधि की अनुपस्थिति: इस पूरी अवधि के दौरान कोर मानसून जोन के भीतर किसी भी विरोधाभासी शुष्क परिस्थिति के साक्ष्य नहीं मिले हैं।
    • कोर मानसून क्षेत्र (CMZ) भारत का एक जलवायु-निर्धारित क्षेत्र है, जहाँ दक्षिण-पश्चिमी (ग्रीष्मकालीन) मानसून से निरंतर और भारी वर्षा होती है।
  • मानसून को शक्तिशाली बनाने वाले बहुआयामी कारक: वैश्विक और क्षेत्रीय कारकों का सम्मिश्रण, जैसे ला-नीना (La-Niña), अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का उत्तर की ओर खिसकना, सकारात्मक तापमान विसंगतियाँ, सौर कलंकों की संख्या में वृद्धि और उच्च सौर गतिविधि मध्यकालीन जलवायु विसंगति (MCA) के दौरान जलवायु परिवर्तन और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISM) में वृद्धि के मुख्य प्रेरक हो सकते हैं।
    • अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) भूमध्य रेखा के निकट स्थित एक निम्न-वायुदाब वाली पेटी है, जहाँ उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें अभिसरित होती हैं (आपस में मिलती हैं), जिसके परिणामस्वरूप तीव्र संवहन, बादलों का निर्माण और भारी वर्षा होती है।

निष्कर्षों का महत्त्व

  • वर्तमान जलवायु समझ को बढ़ाना: होलोसीन (Holocene) युग के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISM) और उससे संबंधित जलवायु परिवर्तन की परिवर्तनशीलता का अध्ययन, वर्तमान मानसून-प्रभावित जलवायु परिस्थितियों के साथ-साथ भविष्य की जलवायु प्रवृत्तियों और अनुमानों की हमारी समझ को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।
  •  जलवायु मॉडल के लिए इनपुट: वर्तमान अध्ययन में प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले पुरा-जलवायु रिकॉर्ड, भविष्य की जलवायु प्रवृत्तियों और वर्षा के पैटर्न के अनुकरण के लिए पुरा-जलवायु मॉडल विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, ये सामाजिक प्रासंगिकता के प्रमुख पहलुओं के साथ वैज्ञानिक रूप से सत्यापित नीति निर्माण में भी मदद कर सकते हैं।

Source:
Tribune India
PIB
ED Publica

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