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सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन एवं कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
संदर्भ: प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (PMJVM) के तहत 4,172 वन धन विकास केंद्रों (Van Dhan Vikas Kendras) को मंजूरी दी गई है, जिनके माध्यम से 12.48 लाख जनजातीय सदस्यों को लघु वनोपज के मूल्य संवर्धन और बाजार के अवसरों से जोड़ा गया है।
प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (PMJVM) के बारे में
- शुरुआत: जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा 2021–22 में एक अम्ब्रेला योजना के रूप में शुरू किया गया। इसे न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से लघु वनोपज के विपणन की व्यवस्था एवं MFP के लिए मूल्य श्रृंखला का विकास तथा जनजातीय उत्पादों के विकास एवं विपणन के लिए संस्थागत सहायता को मिलाकर बनाया गया।

- नोडल एजेंसी: भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (TRIFED), जो इस योजना को सीधे अथवा राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से लागू करता है।
- उद्देश्य: लघु वनोपज (MFP), कृषि एवं गैर-कृषि उत्पादों के कुशल, समानतापूर्ण और स्व-प्रबंधित उपयोग को बढ़ावा देकर, मूल्य संवर्धन एवं बाजार संपर्क के माध्यम से जनजातीय आजीविका और उद्यमिता को मजबूत करना।
- मुख्य विज़न: यह मिशन जनजातीय संग्राहकों को समुदाय-स्वामित्व वाले वन धन विकास केंद्रों (VDVKs) में संगठित करता है, जिससे वे कच्चे उत्पादों की बिक्री से आगे बढ़कर मूल्य-वर्धित एवं बाजार योग्य उत्पादों के निर्माण और बिक्री की ओर बढ़ सकें।
PMJVM की प्रमुख विशेषताएँ
- लघु वनोपज एवं MSP सहायता: वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अनुसार, लघु वनोपज (MFP) में पादप मूल के गैर-काष्ठ वन उत्पाद शामिल हैं, जैसे बांस, बेंत, शहद, मोम, लाख, तेंदू पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटियाँ, जड़ें एवं कंद।
- सरकार ने 87 लघु वनोपज वस्तुओं के लिए MSP अधिसूचित किया है। TRIFED राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से पूर्व-निर्धारित MSP पर लघु वनोपज की खरीद करता है। 2013–14 से अब तक 2,67,954 मीट्रिक टन लघु वनोपज की ₹693.98 करोड़ मूल्य की खरीद की जा चुकी है।
- वन धन विकास केंद्र (VDVKs): वन धन विकास केंद्रजनजातीय संग्राहकों को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित करते हैं, ताकि संग्रहण, प्राथमिक प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन किया जा सके। सामान्यतः एक क्लस्टर में 15 स्वयं सहायता समूहों और लगभग 300 सदस्य होते हैं, जिनमें कम से कम 60% सदस्य अनुसूचित जनजाति (ST) के होते हैं।
- 2018 में शुरू की गई वन धन योजना इस मॉडल का आधार है। यह समुदायों को स्थानीय रूप से उपलब्ध उत्पादों को मूल्य-वर्धित एवं बाजार योग्य उत्पादों में बदलने में सक्षम बनाती है।
- कौशल, अवसंरचना एवं उद्यम सहायता: प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के तहत वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके साथ ड्रायर, डिकॉर्टिकेटर, कटिंग एवं छंटाई उपकरण तथा पैकेजिंग उपकरण जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
- यह कार्यशील पूंजी, भंडारण एवं परिवहन की सुविधा भी प्रदान करता है तथा वन धन विकास केंद्रों और वन धन उत्पादक उद्यमों (VDPEs) को सहायता देता है।
- बाजार एवं डिजिटल संपर्क: वन धन विकास केंद्रों को जनजातीय क्षेत्रों के 5,000 से अधिक हाट बाजारों से जोड़ा गया है। इन बाजारों को भंडारण, तौल सुविधाओं, पेयजल, छायादार स्थान और स्थायी संरचनाओं जैसी सुविधाओं के माध्यम से आधुनिक बनाया जा रहा है।
- TRIFED बाजार संबंधी जानकारी एवं ई-कॉमर्स के अवसर उपलब्ध कराता है। प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के तहत ब्रांडिंग, प्रदर्शनियाँ, भौगोलिक संकेतक (GI), जियो-टैगिंग, IT एवं ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) को भी बढ़ावा दिया जाता है।
आवश्यकता एवं महत्त्व
- आजीविका सुरक्षा: कई अनुसूचित जनजाति परिवारों की वार्षिक आय का लगभग 20–40% हिस्सा लघु वनोपज से प्राप्त होता है। इसलिए PMJVM जनजातीय आजीविका को मजबूत एवं विविधीकृत करने में महत्वपूर्ण है।
- मूल्य संवर्धन एवं उचित पारिश्रमिक: यह समुदायों को कच्चे उत्पाद बेचने के बजाय प्रसंस्करण, ब्रांडिंग एवं विपणन की ओर बढ़ने में सक्षम बनाता है, जबकि MSP मूल्य सुरक्षा प्रदान करता है।
- सामुदायिक स्वामित्व एवं महिला सशक्तिकरण: यह सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा देता है, जिनमें जनजातीय समुदाय, विशेष रूप से महिलाएँ, उत्पादक, उद्यमी एवं स्वामी के रूप में भागीदारी करती हैं।
- उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश के न्यीगामाने, हो योरबे, मेडुमहगडुम वन धन विकास केंद्र में 300 महिला स्वयं सहायता समूह सदस्य एवं किसान शामिल हैं और इसने 2022–23 से ₹11 लाख मूल्य के उत्पाद बेचे हैं।
- सतत वन अर्थव्यवस्था: यह पारंपरिक ज्ञान एवं स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों को आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण एवं बाजार तक पहुँच के साथ जोड़ता है तथा सतत संग्रहण को बढ़ावा देता है।
- समावेशी विकास: जनजातीय आजीविका, उद्यमिता एवं बाजार भागीदारी को मजबूत करना समावेशी विकास तथा विकसित भारत@2047 के व्यापक दृष्टिकोण को समर्थन देता है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- परिचालन संबंधी अंतराल: स्वीकृत 4,172 वन धन विकास केंद्रों में से केवल 2,911 कार्यशील हैं। यह स्वीकृत केंद्रों को वास्तविक सामुदायिक उद्यमों में बदलने में मौजूद अंतराल को दर्शाता है।
- सीमित बाजार पहुँच: न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं बाजार-संपर्क तंत्र के बावजूद दूरस्थ जनजातीय समुदायों को खरीद केंद्रों, संगठित बाजारों एवं उचित मूल्य देने वाले खरीदारों तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
- डिजिटल एवं अवसंरचनात्मक बाधाएँ: दूरस्थ वन क्षेत्रों में सीमित डिजिटल पहुँच, कनेक्टिविटी एवं डिजिटल साक्षरता ई-कॉमर्स एवं डिजिटल बाजार प्लेटफॉर्म के उपयोग में बाधा बन सकती है।
- मूल्य संवर्धन का विस्तार: कार्यशील वन धन विकास केंद्रों द्वारा लगभग ₹168 करोड़ की रिपोर्टेड बिक्री यह दर्शाती है कि अधिक वाणिज्यिक स्तर प्राप्त करने के लिए प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, उद्यम क्षमता एवं बाजार संपर्क को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
