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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संदर्भ: हाल ही में जारी पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (Environmental Performance Index – EPI) 2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर रहा, जिससे वह पर्यावरणीय सततता के मामले में विश्व के सबसे निम्न प्रदर्शन करने वाले देशों में बना हुआ है।
सूचकांक के प्रमुख वैश्विक निष्कर्ष
• एस्टोनिया ने 74.79 अंकों के साथ पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक 2026 में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद लक्ज़मबर्ग (द्वितीय), यूनाइटेड किंगडम (तृतीय), फिनलैंड (चतुर्थ) तथा नीदरलैंड (पंचम) स्थान पर रहे।
• जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन तथा ऑस्ट्रिया ने शीर्ष 10 देशों की सूची को पूरा किया।
• शीर्ष पाँच स्थानों पर यूरोप के पाँच देशों का होना उनके मजबूत पर्यावरणीय शासन एवं सतत विकास प्रदर्शन को दर्शाता है।
• लाओस 21.78 अंकों के साथ 177वें स्थान पर रहा।
• रिपोर्ट के अनुसार, EPI स्कोर और राष्ट्रीय आय के बीच मजबूत सहसंबंध (सहसंबंध गुणांक: 0.69) पाया गया। हालांकि, समान आय स्तर वाले देशों के पर्यावरणीय प्रदर्शन में उल्लेखनीय अंतर भी देखा गया, जिससे स्पष्ट होता है कि नीतिगत निर्णय अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
• यह सूचकांक वायु गुणवत्ता, जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, सतत वानिकी, जल गुणवत्ता तथा ग्रीनहाउस गैसों में कमी से संबंधित वैश्विक सततता चुनौतियों को रेखांकित करता है, साथ ही इन क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले तथा पिछड़ने वाले देशों की भी पहचान करता है।

सूचकांक में भारत से संबंधित प्रमुख निष्कर्ष
• समग्र प्रदर्शन: भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर रहा, जिससे वह वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे निम्न प्रदर्शन करने वाला देश बना। भारत का कुल EPI स्कोर 22.46 रहा, जबकि क्षेत्रीय औसत 31.81 था।
- दक्षिण एशिया में भारत 8 देशों में 7वें स्थान पर रहा।
• क्षेत्रवार प्रदर्शन: भारत का प्रदर्शन पर्यावरणीय स्वास्थ्य, विशेषकर वायु गुणवत्ता, तथा जैव विविधता के क्षेत्र में कमजोर रहा और इन दोनों श्रेणियों में भारत 174वें स्थान पर रहा।
- प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में भारत का वृक्ष आच्छादन हानि स्कोर -3.92 दर्ज किया गया।
- जलवायु परिवर्तन (130वाँ स्थान) तथा अपशिष्ट प्रबंधन एवं स्वच्छता (दोनों में 141वाँ स्थान) के क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर रहा।
- जलवायु परिवर्तन उन क्षेत्रों में से एक रहा, जिनमें पिछले दस वर्षों के दौरान 13.98 अंकों का सुधार दर्ज किया गया।
• भारत की निम्न रैंकिंग के कारक: रिपोर्ट के अनुसार, भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अभी अपेक्षाकृत कम है, किंतु इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है।
- भारत विकास और प्रदूषण के बीच तीव्र संतुलन संबंधी चुनौती का सामना कर रहा है।
- करोड़ों लोगों को आधुनिक ऊर्जा सेवाओं तक पहुंच मिली है, किंतु इसके साथ शहरी वायु प्रदूषण में वृद्धि तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी बढ़ा है।
- पिछले दस वर्षों में वायु गुणवत्ता, मत्स्य संसाधन, वृक्ष आच्छादन तथा कीटनाशक प्रदूषण के क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन कमजोर हुआ है।
- वायु गुणवत्ता के क्षेत्र में, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत ₹16,423 करोड़ व्यय किए जाने के बावजूद, पिछले दशक में भारत का स्कोर 0.15 अंक घट गया।
• रैंकिंग की प्रवृत्ति एवं सरकार की प्रतिक्रिया: भारत की रैंकिंग 2016 में 141वें, 2018 में 177वें, 2020 में 168वें, 2022 में 180वें तथा 2024 और 2026 में 176वें स्थान पर रही।
- 2022 में, जब भारत 180 देशों में 180वें स्थान पर रहा, तब पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने इस रैंकिंग को अस्वीकार करते हुए कहा कि सूचकांक के कई संकेतक निराधार मान्यताओं पर आधारित हैं तथा कुछ संकेतकों का आकलन अनुमानों और अवैज्ञानिक विधियों के आधार पर किया गया है।
- इन आपत्तियों के उत्तर में येल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कहा कि EPI देशों की वर्तमान पर्यावरणीय प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग करता है, न कि उनकी नीतिगत मंशाओं के आधार पर। उनके अनुसार, भारत का निम्न स्कोर वायु गुणवत्ता, जल गुणवत्ता, कृषि, मत्स्य क्षेत्र तथा अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर कमजोर प्रदर्शन को दर्शाता है।
पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI) 2026 के बारे में

• पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI) एक द्विवार्षिक, डेटा-आधारित वैश्विक सूचकांक है, जिसे येल सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ एंड पॉलिसी, सेंटर फॉर इंटरनेशनल अर्थ साइंस इंफॉर्मेशन नेटवर्क (CIESIN), कोलंबिया विश्वविद्यालय, तथा येल सेंटर फॉर जियोस्पेशियल सॉल्यूशंस द्वारा मैककॉल मैकबेन फाउंडेशन (McCall MacBain Foundation) के सहयोग से विकसित किया जाता है।
• EPI 2026 में 177 देशों का मूल्यांकन 47 संकेतकों के आधार पर किया गया है, जिन्हें 12 विषयगत श्रेणियों तथा तीन नीतिगत उद्देश्यों पर्यावरणीय स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र की जीवन्तता और जलवायु परिवर्तन के अंतर्गत व्यवस्थित किया गया है।
• ये संकेतक वायु एवं जल गुणवत्ता, जैव विविधता, सतत वानिकी, मत्स्य संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छता, कीटनाशक प्रदूषण, वृक्ष आच्छादन तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसे क्षेत्रों में देशों के प्रदर्शन का आकलन करते हैं।
• यह सूचकांक नीति-निर्माताओं को सतत विकास की प्रगति का आकलन करने, पारिस्थितिकीय कमजोरियों की पहचान करने, पर्यावरणीय नीतियों को परिष्कृत करने तथा संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और पेरिस जलवायु समझौते की दिशा में हुई प्रगति को मापने के लिए एक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन-पत्र उपलब्ध कराता है।
