संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाना, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: हाल ही में नीति आयोग ने ‘विकसित भारत@2047 के लिए कौशल विकास की पुनर्कल्पना (Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047)’ नामक रिपोर्ट जारी की है। इसमें प्रशिक्षण-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर परिणाम-उन्मुख और आजीवन कौशल विकास की ओर बदलाव प्रस्तावित किया गया है। इसका उद्देश्य बदलती श्रम-बाजार आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है।

अन्य संबंधित जानकारी 

• रिपोर्ट भारत के कौशल विकास पारिस्थितिकी तंत्र का आकलन शिक्षार्थियों/कार्यबल के पाँच वर्गों के आधार पर करती है, जिनमें कुल मिलाकर लगभग 60 करोड़ नागरिक शामिल हैं। 

• भारत में 2014–15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जबकि वित्त वर्ष 2025–26 में केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा कौशल विकास से संबंधित व्यय के लिए ₹34,000 करोड़ आवंटित किए गए। 

• रिपोर्ट के अनुसार 15–29 वर्ष आयु वर्ग के 8.7 करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में शामिल नहीं हैं (NEET)। यह कौशल विकास और आर्थिक भागीदारी के लिए एक बड़े अप्रयुक्त मानव संसाधन की ओर संकेत करता है। 

• रिपोर्ट में एकीकृत, लचीला और परिणाम-उन्मुख कौशल विकास तंत्र तैयार करने के लिए पाँच मुख्य सुधार और चार प्रणालीगत सक्षमकारी उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। 

मुख्य निष्कर्ष: भारत के कौशल विकास की चुनौती

• बड़े पैमाने पर, लेकिन असमान कौशल विकास प्रयास: 2014–15 से 7.67 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित किए जाने के बावजूद, रिपोर्ट प्रशिक्षण, रोजगार, आय और करियर में प्रगति के बीच लगातार बने हुए अंतराल को रेखांकित करती है। 

• विविध श्रम बाजार: वर्ष 2024 में भारत की लगभग 145 करोड़ आबादी में 65.4 करोड़ का श्रमबल शामिल था। कार्यरत लोगों में 58.4% स्वरोजगार, 21.7% नियमित वेतनभोगी/वेतनभोगी तथा 19.8% आकस्मिक श्रमिक थे। रिपोर्ट में जनसंख्या संबंधी आँकड़े विभिन्न डेटासेट और वर्षों पर आधारित हैं, जो व्यापक रूप से 2021–24 की अवधि को कवर करते हैं। 

• NEET युवा और महिलाओं के सामने लगातार बाधाएँ: लगभग 8.7 करोड़ (11%) 15–29 वर्ष आयु वर्ग के युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में शामिल नहीं हैं (NEET)। इनमें लगभग 88% घरेलू कार्यों में संलग्न हैं। केवल लगभग 3% महिलाएँ औपचारिक रोजगार में हैं, जबकि 71% या तो अनौपचारिक कार्य में हैं या NEET वर्ग में आती हैं। 

• सूचना और पहुँच संबंधी अंतराल: कौशल विकास में जागरूकता की कमी एक प्रमुख बाधा है। यह 47% महिलाओं, 43% NEET युवाओं, 36% उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों, 52% औपचारिक श्रमिकों और 55% अनौपचारिक श्रमिकों द्वारा बताए गए शीर्ष तीन कारणों में शामिल है। इसके अलावा, उद्यमिता की आकांक्षा रखने वाले उच्च शिक्षा के 61% विद्यार्थी इसे आगे बढ़ाने के उपलब्ध मार्गों से अनभिज्ञ हैं। 

• शिक्षा–उद्योग के बीच कमजोर संबंध: प्रत्येक 12 माध्यमिक विद्यालयों में से 1 से भी कम विद्यालय व्यावसायिक विषय प्रदान करते हैं। विखंडन, डिग्री-केंद्रित भर्ती, उद्योगों की सीमित सह-भागीदारी और सीखने की उपलब्धियों की कमजोर पोर्टेबिलिटी शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के बीच सुगम संक्रमण में बाधा डालती हैं। 

नीति आयोग की पुनर्कल्पित कौशल विकास संरचना

पाँच मुख्य सुधार

• विद्यालयों में कौशल का एकीकरण: कक्षा 6–12 से सामान्य रोजगारपरक एवं उद्यमिता कौशल (GEES) शुरू करने तथा कक्षा 9 से ‘कौशल ट्रैक’ लागू करने का प्रस्ताव है, ताकि व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल किया जा सके। 

• तकनीकी एवं उच्च शिक्षा में व्यवहार्य PPP/PSE मॉडल: उद्योग से जुड़े और कार्य-एकीकृत कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, जिनमें अप्रेंटिसशिप-एम्बेडेड डिग्री/डिप्लोमा कार्यक्रम (AEDP) तथा लचीले ‘सीखते हुए कमाएँ’ (Earn-while-you-learn) मॉडल शामिल हैं। 

• परिणाम-आधारित, उद्योग-समर्थित कार्यक्रम: नामांकन और प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के बजाय रोजगार, वेतन और करियर में प्रगति के परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना तथा इन्हें उभरते क्षेत्रों और बदलती व्यावसायिक मांग के अनुरूप तैयार करना। 

• सभी के लिए अप्रेंटिसशिप: अप्रेंटिसशिप को मुख्यधारा के ‘सीखने और कमाने’ के मार्ग के रूप में विस्तारित करना। इसके लिए MSME क्षेत्र की अधिक भागीदारी और बेहतर पहुँच सुनिश्चित करना। 

• मार्गदर्शन और धारणा-निर्माण: निरंतर करियर मार्गदर्शन एवं परामर्श उपलब्ध कराना तथा व्यावसायिक शिक्षा से जुड़े सामाजिक दृष्टिकोण और सूचना संबंधी अंतराल को दूर करना।

चार प्रणालीगत सक्षमकारी उपाय 

• डिजिटल आजीवन अधिगम खाते/कौशल पासपोर्ट: प्रमाण-पत्र, कौशल और कार्य-अनुभव का पोर्टेबल रिकॉर्ड तैयार करना, जिससे शिक्षार्थी विभिन्न संस्थानों और रोजगारों के बीच अपने सीखने एवं कार्य के इतिहास को साथ ले जा सकें। 

• परिणाम-आधारित वित्तपोषण: वित्तपोषण को केवल नामांकन या पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय नियुक्ति, वेतन में वृद्धि और रोजगार में बने रहने जैसे सत्यापित परिणामों से तेजी से जोड़ना। 

• NCrF का क्रियान्वयन: शैक्षणिक, व्यावसायिक और कार्य-आधारित शिक्षा मार्गों के बीच पोर्टेबल एवं संचयी अधिगम को सक्षम बनाना। इसमें पूर्व अधिगम की मान्यता (Recognition of Prior Learning—RPL) भी शामिल है। 

• कौशल-प्रथम नीतियाँ और अवसंरचना: कौशल-आधारित भर्ती को बढ़ावा देना तथा जिला-प्रथम कार्यान्वयन दृष्टिकोण के माध्यम से प्रशिक्षण अवसंरचना के साझा उपयोग को प्रोत्साहित करना। 

विकसित भारत के लिए महत्व

• परिणाम-उन्मुख मानव पूंजी: सफलता के प्राथमिक मापदंड के रूप में केवल प्रशिक्षित लोगों की संख्या के बजाय रोजगारपरकता, करियर में प्रगति और टिकाऊ आजीविका पर ध्यान केंद्रित करना। 

• भविष्य के लिए तैयार कार्यबल: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), हरित संक्रमण, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और उभरते उद्योगों के साथ कौशल का बेहतर तालमेल कार्यबल की उत्पादकता और भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा सकता है। 

• समावेशी आर्थिक भागीदारी: महिलाओं, NEET युवाओं और अनौपचारिक श्रमिकों के लिए लक्षित कौशल विकास मार्ग उत्पादक रोजगार में आने वाली बाधाओं को कम कर सकते हैं और अपर्याप्त रूप से उपयोग की जा रही मानव पूंजी का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर सकते हैं। 

• आजीवन अधिगम और गतिशीलता: NCrF, पोर्टेबल प्रमाण-पत्र और लचीले अधिगम मार्ग शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के बीच आवागमन को सुगम बना सकते हैं तथा व्यक्तियों को अपने पूरे करियर के दौरान पुनः सीखने के अवसर प्रदान कर सकते हैं।

Shares: