संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, गठन और कार्यप्रणाली, सरकार के मंत्रालय और विभाग।

संदर्भ: भारतीय उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक आदेश के माध्यम से देश में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के व्यावहारिक कार्यान्वयन की अनुमति प्रदान की है। इसके अंतर्गत न्यायालय ने विगत 12 वर्षों से अधिक समय से कोमा में उपचाराधीन एक 32 वर्षीय व्यक्ति के कृत्रिम जीवन रक्षक तंत्र को हटाने का निर्देश दिया।

अन्य संबंधित जानकारी:

• न्यायालय ने ‘नैदानिक रूप से सहायता प्राप्त पोषण और जलयोजन’ (Clinically Assisted Nutrition and Hydration – CANH) को हटाने की अनुमति दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ में ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ भी सम्मिलित है।

• यह मामला उच्चतम न्यायालय द्वारा 2018 में ‘कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ’ मामले में जारी किए गए निष्क्रिय इच्छामृत्यु के दिशानिर्देशों का पहला व्यावहारिक कार्यान्वयन है।

निर्णय के मुख्य बिंदु

• जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति: न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि निरंतर उपचार अब रोगी के सर्वोत्तम हित में नहीं है, ‘नैदानिक रूप से सहायता प्राप्त पोषण और जलयोजन’ (CANH) को हटाने की अनुमति दी।

• CANH को चिकित्सा उपचार के रूप में मान्यता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि CANH (जैसे PEG ट्यूब के माध्यम से दिया जाने वाला पोषण) तकनीकी रूप से मध्यस्थ चिकित्सा हस्तक्षेप है, जो स्वास्थ्य पेशेवरों की देखरेख में किया जाता है। अतः इसे ‘चिकित्सा उपचार’ माना जाएगा, भले ही यह घर पर दिया जा रहा हो।

• उपचार वापसी की शर्तें: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा उपचार को हटाने या रोकने के लिए दो मानदंडों को पूरा किया जाना अनिवार्य है:

  • हस्तक्षेप को चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आना चाहिए।
  • उसे हटाना रोगी के सर्वोत्तम हित में होना चाहिए, विशेषकर तब जब उपचार निष्प्रभावी या व्यर्थ हो जाए।

• प्रशामक और जीवन-अंत देखभाल का एकीकरण: न्यायालय ने निर्देश दिया कि जीवन रक्षक प्रणाली को हटाना एक व्यवस्थित प्रशामक और जीवन-अंत (EOL) देखभाल योजना के तहत होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि रोगी को कोई पीड़ा या उसकी गरिमा की ठेस न पहुँचे।

• चिकित्सा बोर्डों की भूमिका: यह निर्णय रोगी के परिवार और कई चिकित्सा बोर्डों के साथ व्यापक परामर्श के बाद लिया गया, जिन्होंने सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की कि निरंतर उपचार से स्थिति में सुधार नहीं होगा।

• विधान की आवश्यकता: न्यायालय ने केंद्र सरकार से जीवन-अंत देखभाल और जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने पर एक व्यापक कानून बनाने का आग्रह किया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि कानून के अभाव में वित्तीय संकट या बीमा की कमी जैसे गैर-चिकित्सीय कारक निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।

• न्यायिक प्रेक्षण: पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने का अर्थ रोगी को लावारिस छोड़ना नहीं है; बल्कि, यह मानवीय देखभाल सुनिश्चित करते हुए मृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया को अनुमति देना है।

इच्छामृत्यु के बारे में 

• इच्छामृत्यु का तात्पर्य किसी असाध्य या प्राणघातक चिकित्सीय स्थिति के कारण होने वाली पीड़ा को कम करने के लिए रोगी के जीवन को समाप्त करने की प्रथा से है।

• चिकित्सा नैतिकता और कानून में सामान्यतः इसके दो मुख्य रूपों पर चर्चा की जाती है—सक्रिय इच्छामृत्यु और निष्क्रिय इच्छामृत्यु।

• सक्रिय इच्छामृत्यु में मृत्यु करने के उद्देश्य से सीधा चिकित्सा हस्तक्षेप करना शामिल होता है, जैसे कि प्राणघातक इंजेक्शन या औषधि देना।

  • इस स्थिति में, मृत्यु रोगी के जीवन को समाप्त करने के लिए किए गए एक सुविचारित कृत्य के कारण होती है। अपनी सोद्देश्य प्रकृति के कारण, सक्रिय इच्छामृत्यु को कई न्यायक्षेत्रों में व्यापक रूप से गैर-कानूनी माना जाता है।

• निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन-रक्षक चिकित्सा उपचार को रोकना या वापस लेना शामिल है, जिससे रोगी को तब स्वाभाविक रूप से मरने दिया जाता है जब सुधार चिकित्सकीय रूप से असंभव हो या उपचार को व्यर्थ माना जाए।

  • इसके उदाहरणों में कृत्रिम श्वसन को रोकना, भोजन नलिका को हटाना, या अन्य जीवन-रक्षक प्रणालियों को बंद करना शामिल है।

• उच्चतम न्यायालय द्वारा स्पष्टीकरण: उच्चतम न्यायालय ने यह पाया कि “निष्क्रिय इच्छामृत्यु” अभिव्यक्ति भ्रामक हो सकती है, क्योंकि यह जीवन समाप्त करने के लिए किसी सुविचारित कृत्य का संकेत दे सकती है।

  • अतः न्यायालय ने सुझाव दिया है कि इस पद्धति को अधिक सटीक रूप से “चिकित्सा उपचार को वापस लेना या रोकना” के रूप में वर्णित किया जाना चाहिए।

• स्थायी चेतनशून्य अवस्था (Persistent Vegetative State – PVS): स्थायी चेतनशून्य अवस्था (PVS) एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसमें रोगी जागृत तो दिखता है, परंतु उसे स्वयं या अपने परिवेश का बोध नहीं होता है।

  • यद्यपि ऐसे रोगियों में जैविक प्रतिवर्त और निद्रा-जागरण की चक्रिक प्रक्रियाएँ बनी रहती हैं, तथापि उनमें बाह्य वातावरण के प्रति चेतना और सार्थक अनुक्रिया का पूर्ण अभाव पाया जाता है।
  • जब यह स्थिति लंबी अवधि तक बनी रहती है, तो इसे ‘अपरिवर्तनीय चेतनशून्य अवस्था’ के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

भारत में इच्छामृत्यु पर कानूनी स्थिति 

• संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि इसमें उपयुक्त परिस्थितियों में ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ भी सम्मिलित है।

• प्रमुख न्यायिक घटनाक्रम:

  • ज्ञान कौर मामला (1996): उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया कि जीवन रक्षक प्रणाली को वापस लेने से मृत्यु की प्रक्रिया तेज हो सकती है, जिससे निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर कानूनी चर्चा का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • अरुणा शानबाग मामला (2011): न्यायालय ने असाधारण परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश निर्धारित किए।
  • कॉमन कॉज़ निर्णय (2018): एक संविधान पीठ ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को मान्यता दी और ‘अग्रिम चिकित्सा निर्देश’ (Living Wills) की अवधारणा पेश की, जिससे व्यक्ति पहले से यह निर्दिष्ट कर सकते हैं कि लाइलाज स्थिति में जीवन रक्षक प्रणाली हटानी चाहिए या नहीं।
  • दिशानिर्देशों में संशोधन (2023): न्यायालय ने उपचार वापस लेने की प्रक्रिया को सरल बनाया, जिसमें मेडिकल बोर्ड के निर्णयों के लिए समय-सीमा निर्धारित करना और प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम करना शामिल है।

• सरकारी दिशानिर्देश: वर्ष 2024 में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन शर्तों को रेखांकित करते हुए प्रारूप दिशानिर्देश जारी किए, जिनके तहत जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने पर विचार किया जा सकता है:

  • मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 के तहत ‘ब्रेन-स्टेम डेथ’ ।
  • ऐसी उन्नत और अपरिवर्तनीय बीमारी जिसमें आक्रामक उपचार से लाभ होने की संभावना न हो।
  • रोगी या उसके प्रतिनिधि निर्णयकर्ता द्वारा सूचित निर्णय के बाद उपचार से इनकार करना।
  • उच्चतम न्यायालय की प्रक्रियाओं का अनुपालन।

• वर्तमान स्थिति: सख्त दिशानिर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (उपचार को वापस लेना या रोकना) की अनुमति है।

  • भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी गैर-कानूनी है।

SOURCES:
The Hindu
The Hindu
The Hindu
Indian Express
News on Air

Shares: