संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास  और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में संशोधन करते हुए विदेशी निवेश वाली ई-कॉमर्स कंपनियों को भारत में निर्मित एवं/या उत्पादित वस्तुओं के केवल निर्यात के लिए इन्वेंट्री-आधारित ई-कॉमर्स मॉडल संचालित करने की अनुमति दी है।

निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ

  • उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने वर्तमान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति की समीक्षा कर केवल निर्यात के उद्देश्य से भंडार-आधारित ई-कॉमर्समॉडल के लिए निवेश संबंधी नियमों में छूट प्रदान की है।
  • नीति में एक नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके अनुसार ई-कॉमर्स इकाई को भारत में निर्मित एवं/या उत्पादित वस्तुओं/उत्पादों के केवल निर्यात के लिए इन्वेंट्री-आधारित ई-कॉमर्स मॉडल अपनाने की अनुमति होगी।
  • यह छूट केवल भारत में निर्मित एवं/या उत्पादित वस्तुओं के निर्यात पर लागू होगी तथा घरेलू खुदरा बिक्री पर लागू नहीं होगी।
  • घरेलू बाजार के लिए व्यवसाय-से-उपभोक्ता (B2C) तथा भंडार-आधारित ई-कॉमर्स से संबंधित वर्तमान प्रतिबंध यथावत बने रहेंगे।
  • निर्यात संबंधी सभी गतिविधियों को विदेश व्यापार नीति, 2023, प्रक्रिया पुस्तिका तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन (वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात) विनियम, 2015, तथा समय-समय पर किए गए उनके संशोधनों का पालन करना होगा।
  • यह निर्णय विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के अंतर्गत अधिसूचना जारी होने की तिथि से प्रभावी होगा।

ई-कॉमर्स में एफडीआई के बारे में

  • वर्तमान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति: भारत में व्यवसाय-से-व्यवसाय (B-2-B) ई-कॉमर्स तथा बाज़ार-आधारित ई-कॉमर्स मॉडल में स्वचालित मार्ग के तहत 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है।
    • जबकि व्यवसाय-से-उपभोक्ता (B-2-C) ई-कॉमर्स तथा भंडार-आधारित ई-कॉमर्स मॉडल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति नहीं है।
  • बाज़ार-आधारित मॉडल: इस मॉडल में ई-कॉमर्स कंपनी क्रेताओं और विक्रेताओं को जोड़ने के लिए एक डिजिटल मंच उपलब्ध कराती है।
    • यह मंच केवल मध्यस्थ की भूमिका निभाता है तथा वस्तुओं का स्वामित्व अपने पास नहीं रखता।
    • वस्तुओं की बिक्री स्वतंत्र विक्रेताओं द्वारा इस मंच के माध्यम से की जाती है।
  • इन्वेंट्री-आधारित मॉडल: इस मॉडल में ई-कॉमर्स कंपनी वस्तुओं एवं सेवाओं के भंडार का स्वामित्व स्वयं रखती है।
    • प्लेटफॉर्म द्वारा उपभोक्ताओं को सीधे वस्तुओं की बिक्री की जाती है।
    • इस मॉडल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति नहीं थी, क्योंकि इससे विदेशी कंपनियों को बहु-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रवेश का अवसर मिल जाता, जहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर लंबे समय से कठोर प्रतिबंध लागू हैं।
    • यह प्रतिबंध मूलतः घरेलू खुदरा व्यापार को विनियमित करने तथा छोटे खुदरा व्यापारियों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से लगाया गया था।

इस बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • निर्यात को बढ़ावा देने हेतु: यह संशोधन भारतीय विक्रेताओं को वैश्विक बाजारों तक आसान पहुँच प्रदान करेगा तथा वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वस्तु निर्यात के सरकारी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों पर अनुपालन बोझ कम करने हेतु: बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियाँ निर्यात से संबंधित दस्तावेज़ीकरण, कागजी औपचारिकताएँ, परीक्षण एवं लेबलिंग जैसी प्रक्रियाएँ संभाल सकेंगी। इससे उन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को लाभ होगा, जिनमें वर्तमान में केवल लगभग 12,000 उद्यम ही ऑनलाइन माध्यम से निर्यात कर रहे हैं।
  • वैश्विक अनुरेखण आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु: बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियाँ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को नए वैश्विक अनुरेखण मानकों का पालन करने में सहायता करेंगी, जिनमें यूरोपीय संघ का डिजिटल उत्पाद पासपोर्ट (DPP) भी शामिल है।
  • अमेरिकी शुल्क संबंधी चुनौतियों का सामना करने हेतु: यह संशोधन ऐसे समय किया गया है, जब संयुक्त राज्य अमेरिका 10% वैश्विक आयात शुल्क व्यवस्था को समाप्त कर भारत से आयातित कुछ वस्तुओं पर 12.5% शुल्क लगाने का प्रस्ताव कर रहा है। ऐसे में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना और अधिक आवश्यक हो गया है।
  • नीतिगत स्पष्टता प्रदान करने हेतु: यह संशोधन स्पष्ट करता है कि भंडार-आधारित मॉडल से संबंधित प्रतिबंध निर्यात गतिविधियों पर लागू नहीं होंगे। इससे नीति की स्पष्टता एवं पूर्वानुमेयता बढ़ेगी, साथ ही घरेलू ई-कॉमर्स क्षेत्र के लिए वर्तमान सुरक्षा उपाय भी यथावत बने रहेंगे।

महत्त्व

  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के निर्यात को बढ़ावा: यह संशोधन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को बड़ी अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुँच प्रदान करेगा तथा दस्तावेज़ीकरण, परीक्षण, लेबलिंग और निर्यात अनुपालन का बोझ कम करेगा।
  • विनिर्माण एवं निर्यात लक्ष्यों को समर्थन: यह सरकार के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को लगभग 17% से बढ़ाकर वर्ष 2035 तक 25% करने तथा वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वस्तु निर्यात के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा।
  • व्यवसाय सुगमता में सुधार: यह संशोधन नीतिगत अनिश्चितता को दूर कर विदेशी निवेशकों के लिए नीति की स्पष्टता एवं पूर्वानुमेयता को मजबूत करेगा।
  • टियर- II और टियर- III शहरों के निर्माताओं को लाभ: इससे क्षेत्रीय निर्माताओं तथा सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को वैश्विक ग्राहकों तक पहुँचने का अवसर मिलेगा तथा ‘ब्रांड इंडिया’ को सुदृढ़ करने में सहायता मिलेगी।
  • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से बेहतर एकीकरण: यह भारतीय निर्मित उत्पादों की खरीद, भंडारण तथा विदेशों में आपूर्ति के लिए अधिक लचीलापन प्रदान करेगा, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत का एकीकरण मजबूत होगा।
Shares: