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सामान्य अध्ययन-2: केंद्र और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व; कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।

संदर्भ: हंसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ (2026) मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि गोद लिए गए बच्चे की आयु के आधार पर दत्तक माताओं को मातृत्व अवकाश देने से इनकार करना असंवैधानिक है।

अन्य संबंधित जानकारी

• उच्चतम न्यायालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को निरस्त  कर दिया है। यह धारा केवल उन दत्तक माताओं को मातृत्व लाभ प्रदान करती थी जिन्होंने तीन माह से कम आयु के बच्चे को गोद लिया हो।

• न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि दत्तक माताएँ 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की पात्र हैं बशर्ते कि बच्चे की आयु कुछ भी हो। इस अवकाश की गणना उस तिथि से की जाएगी जिस दिन बच्चा उन्हें सौंपा गया हो।

• यह निर्णय एक दत्तक माता द्वारा दायर की गई जनहित याचिका के उपरांत दिया गया है। याचिकाकर्ता ने मौजूदा प्रावधान को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे चुनौती दी थी।

• यह विवादास्पद प्रावधान मूल रूप से मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) से लिया गया था। बाद में, इसे सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में भी यथावत समाहित कर लिया गया था।

• न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत में गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। बच्चे को ‘गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त’ घोषित करने और पुनर्विचार अवधि जैसी प्रक्रियाओं में लगने वाले समय के कारण व्यावहारिक रूप से तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेना असंभव है।

• न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि ‘गोद लेना’ माता-पिता बनने का समान रूप से वैध स्वरूप है। इसे अनुच्छेद 21 के तहत एक महिला की प्रजनन स्वायत्तता के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी गई है। न्यायालय के अनुसार, माँ बनने का निर्णय—चाहे वह जैविक हो या गोद लेने के माध्यम से—महिला के निजी जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा है।

• इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को एक ‘सामाजिक सुरक्षा लाभ’ के रूप में शुरू करने का आग्रह किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है, न कि केवल माता का उत्तरदायित्व।

निर्णय के मुख्य बिंदु 

• मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवादित प्रावधान अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) का उल्लंघन करता है क्योंकि यह माताओं के बीच एक अतार्किक वर्गीकरण को जन्म देता है। साथ ही, यह अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के अंतर्गत आने वाली ‘प्रजनन स्वायत्तता’ का भी हनन है।

• अतार्किक और मनमाना वर्गीकरण: आयु-आधारित वर्गीकरण को असंवैधानिक घोषित किया गया। न्यायालय के अनुसार, तीन माह से कम या अधिक आयु के बच्चे को गोद लेने वाली माताओं के बीच कोई बोधगम्य अंतर नहीं है। साथ ही, इस आयु सीमा का मातृत्व लाभ के उद्देश्य से कोई तर्कसंगत संबंध भी नहीं है।

• जीव विज्ञान से परे मातृत्व: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि मातृत्व केवल एक ‘जैविक प्रक्रिया’ नहीं है, बल्कि यह प्रकृति में भावनात्मक और सामाजिक भी है। परिवार बनाने के लिए ‘दत्तक ग्रहण’ एक समान रूप से वैध मार्ग है। दत्तक माताओं के अधिकार और कर्तव्य वहीं हैं जो एक जैविक माता के होते हैं।

• मातृत्व लाभ का उद्देश्य: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘मातृत्व अवकाश’ का संबंध प्रसव से अधिक मातृत्व से है। इसमें न केवल शारीरिक स्वास्थ्य लाभ शामिल है, बल्कि बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव, उसका पालन-पोषण और परिवार में बच्चे का समावेश भी महत्वपूर्ण है। दत्तक ग्रहण के मामले में, चाहे बच्चे की आयु चाहे कितनी भी हो, भावनात्मक जुड़ाव और देखभाल की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

• कानून की व्यावहारिक निष्प्रभाविता: दत्तक ग्रहण कानूनों (जैसे CARA और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट – JJ Act) के तहत अनिवार्य प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं के कारण, तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को मुश्किल से ही गोद लिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, सामाजिक सुरक्षा संहिता का यह प्रावधान वास्तविक अनुप्रयोग में काफी हद तक निष्प्रभावी और व्यर्थ हो जाता है।

• संवेदनशील समूहों पर प्रभाव: न्यायालय ने उल्लेख किया कि मातृत्व लाभ पर यह प्रतिबंध दिव्यांग बच्चों को असमान रूप से प्रभावित करता है, क्योंकि उन्हें गोद लेने की प्रक्रिया में अक्सर अधिक समय लगता है। इसके अतिरिक्त, यह एकल दत्तक माताओं के लिए भी कष्टकारी है, जिन पर देखभाल की पूरी जिम्मेदारी होती है। यह प्रतिबंध महिलाओं को रोजगार और बाल-देखभाल के बीच किसी एक को चुनने के लिए विवश कर सकता है, जिस कारण अंततः कल्याणकारी उद्देश्यों विफल हो जाते हैं।

• पितृत्व अवकाश और लैंगिक समानता: न्यायालय ने पितृत्व अवकाश को व्यापक कानूनी मान्यता देने की पुरजोर अनुशंसा की और इस बात पर बल दिया कि बच्चों का पालन-पोषण एक साझा उत्तरदायित्व है। वर्तमान में सरकारी कर्मचारियों के लिए केवल 15 दिनों के अवकाश जैसे सीमित प्रावधान हैं। ऐसे व्यापक प्रावधानों का अभाव लैंगिक रूढ़िवादिता  को पुष्ट करता है और पिता को अपने बच्चों के साथ शुरुआती जुड़ाव के अवसर से वंचित करता है।

निर्णय का महत्व

• लैंगिक समानता का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय ‘मातृत्व’ को केवल एक जैविक प्रक्रिया से परे मान्यता देता है। दत्तक माताओं को समान अधिकार सुनिश्चित करके यह उनके साथ होने वाले भेदभाव को कम करता है।

• प्रजनन अधिकारों का विस्तार: न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘प्रजनन स्वायत्तता’ के दायरे में ‘दत्तक ग्रहण’ को भी शामिल किया है। यह परिवार और पितृत्व/मातृत्व की पारंपरिक अवधारणा को व्यापक बनाता है।

• बाल-केंद्रित दृष्टिकोण: यह निर्णय कठोर कानूनी वर्गीकरण के बजाय ‘बच्चे के सर्वोत्तम हित’ को प्राथमिकता देता है। यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे का समग्र विकास हो और उसे अपने नए परिवार के साथ पर्याप्त संवेगात्मक जुड़ाव का अवसर मिले।

• कार्यस्थल पर न्याय और कल्याण: यह मातृत्व अवकाश को एक मानवाधिकार के रूप में पुष्ट करता है। यह महिलाओं, विशेष रूप से दत्तक माताओं को, कार्यबल से बाहर होने से रोकता है।

• साझा पालन-पोषण को प्रोत्साहन: पितृत्व अवकाश को बढ़ावा देकर, यह निर्णय लिंग-तटस्थ देखभाल को प्रोत्साहित करता है। यह इस विचार को बल देता है कि बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता का एक साझा उत्तरदायित्व है।

• यथार्थवादी कानून निर्माण: यह निर्णय कानूनी प्रावधानों को दत्तक ग्रहण की व्यावहारिक वास्तविकताओं के साथ जोड़ता है। यह सुनिश्चित करता है कि कानून वास्तविक रूप में प्रभावी और प्रासंगिक बना रहे।

SOURCES
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