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सामान्य अध्ययन-1: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के विभिन्न पहलू शामिल होंगे।
संदर्भ: तमिलनाडु के तेनकासी जिले में वैप्पार नदी के तट पर स्थित करिवलमवंदनल्लूर (मलयाडिपट्टी) में चल रहे पुरातात्त्विक उत्खननों से ऐसी मानव बस्ती के साक्ष्य मिल रहे हैं, जो सूक्ष्म पाषाण काल (माइक्रोलिथिक काल) से लेकर संगम काल तक निरंतर अस्तित्व में रही तथा क्रमिक रूप से विकसित हुई प्रतीत होती है।
प्रमुख निष्कर्ष

- मानव का निरंतर निवास: प्राप्त साक्ष्य सूक्ष्म पाषाण काल से लेकर लौह युग, प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तथा ऐतिहासिक काल तक निरंतर मानव निवास का संकेत देते हैं, जबकि नवपाषाण काल एवं ताम्रपाषाण काल के चरण अनुपस्थित रहे।
- यह सांस्कृतिक क्रम मंगुडी, शिवगलाई तथा आदिचनल्लूर से प्राप्त खोजों के समान है, जबकि उत्तरी तमिलनाडु में सूक्ष्म पाषाण काल–नवपाषाण काल–लौह युग का क्रम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
- संगठित औद्योगिक बस्ती: प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि यह स्थल केवल एक आवासीय बस्ती नहीं था, बल्कि एक संगठित औद्योगिक बस्ती भी था।
- पुरातत्वविदों को लौह निष्कर्षण हेतु हेमेटाइट, लौह उपकरण, काँच के मनके, टेराकोटा की मूर्तियाँ, ग्रैफिटी-चिह्नित मृद्भांड, पिट्ठू (हॉपस्कॉच) खेल की गोटियाँ तथा काला-लाल मृद्भांड सहित अन्य प्रारंभिक ऐतिहासिक कालीन मृद्भांड प्राप्त हुए हैं।
- अन्य खोजों में शंख की चूड़ियाँ, टेराकोटा तकली-चक्र, टेराकोटा चक्रिकाएँ, मूंगे के मनके, एक स्वर्ण मनका, आयताकार खेल की गोटियाँ तथा ताँबे के सिक्के शामिल हैं।
- संरचनात्मक साक्ष्य दर्शाते हैं कि संगम काल में यहाँ लौह उपकरण निर्माण, मनका निर्माण, शंख की चूड़ियों का निर्माण तथा बुनाई से संबंधित कार्यशालाएँ विद्यमान थीं।
- विशाल ईंट निर्मित संरचना: उत्खनन की सबसे महत्त्वपूर्ण खोजों में से एक लगभग 8.7 मीटर × 4.2 मीटर आकार की विशाल ईंट निर्मित संरचना है, जिसका निर्माण 40 × 20 × 7 सेंटीमीटर आकार की ईंटों से किया गया है।
- इस संरचना में नीचे उतरने वाली सीढ़ियाँ हैं तथा माना जाता है कि इसका उपयोग भूमिगत अन्नागार अथवा वर्षा जल संचयन टैंक के रूप में किया जाता था।
- इसकी बनावट यह संकेत देती है कि वैप्पार नदी के निकट स्थित होने के बावजूद इस बस्ती में उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली विद्यमान थी।
- ईंटों का आकार कीलाडी, अलगनकुलम तथा पूम्पुहार में प्राप्त ईंटों के समान है, जिससे इसके प्रारंभिक ऐतिहासिक/संगम काल का होने का संकेत मिलता है।
- संरचना के उद्देश्य एवं काल-निर्धारण के लिए मृदा विश्लेषण तथा कार्बन डेटिंग की जा रही है।
- दफनाने के साक्ष्य: पुरातत्वविदों ने मोरों के चित्रों से अलंकृत लाल लेपित दफन पात्र की खोज की।
- पात्र के बाहर प्राप्त दाढ़ एवं अग्रदाढ़ के दाँत, तथा उसके नीचे रखा काला-लाल मृद्भांड, यह संकेत देते हैं कि इसका उपयोग अस्थिकलश (दफन पात्र) के रूप में किया गया था।
- इस पात्र पर ग्रैफिटी चिह्न भी पाए गए।
- इसी प्रकार के मोर-अलंकृत दफन पात्र पूर्व में पोरुन्थल तथा हड़प्पा सभ्यता के सेमेट्री-एच, जिनमें हड़प्पा, हुलास तथा भिरड़ाना शामिल हैं, से भी प्राप्त हुए हैं, जो इनके अनुष्ठानिक महत्त्व का संकेत देते हैं।
- अकनानूरु, जो एक संगमकालीन ग्रंथ है, उसमें स्मारक शिलाओं को मोर पंखों से सजाने का उल्लेख मिलता है, जो इन पुरातात्त्विक साक्ष्यों को साहित्यिक समर्थन प्रदान करता है।
खोजों का महत्त्व
- ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थल: इस स्थल का महत्त्व पहली बार तब सामने आया जब इस क्षेत्र से रोमन सिक्कों की प्राप्ति की सूचना मिली। इसके बाद एल. ए. कैमियाडे ने इस स्थल का सर्वेक्षण किया, जबकि मद्रास संग्रहालय की 1932–33 की वार्षिक रिपोर्ट में यहाँ से प्राप्त काँच के मनकों तथा दफन कलशों का उल्लेख किया गया।
- विशिष्ट उत्पादन केंद्र के साक्ष्य: प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि यह बस्ती एक विशिष्ट उत्पादन केंद्र के रूप में कार्य करती थी, जहाँ लौह उत्पादन, मनका निर्माण, शंख की चूड़ियों का निर्माण तथा बुनाई से संबंधित गतिविधियाँ संचालित होती थीं।
- आवास, उत्पादन एवं व्यापार का केंद्र: प्राचीन पूर्व–पश्चिम व्यापार मार्ग पर स्थित यह बस्ती आवास, उत्पादन तथा व्यापार का संयुक्त केंद्र प्रतीत होती है, जो इसके व्यापक व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े होने का संकेत देती है।
- पुरातत्त्व एवं संगम साहित्य के बीच सेतु: मोर-अलंकृत दफन कलश तथा अकनानूरु में प्राप्त संदर्भ पुरातात्त्विक साक्ष्यों और संगम साहित्य के बीच संबंध को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।
- विशिष्ट सांस्कृतिक क्रम: उत्खनन से संकेत मिलता है कि दक्षिणी तमिलनाडु में सूक्ष्म पाषाण काल–लौह युग–प्रारंभिक ऐतिहासिक काल का सांस्कृतिक क्रम विकसित हुआ, जो उत्तरी तमिलनाडु के सूक्ष्म पाषाण काल–नवपाषाण काल–लौह युग क्रम से भिन्न है।
- तमिलनाडु के पुरातात्त्विक अभिलेख को सुदृढ़ करता है: कीलाडी, शिवगलाई, मंगुडी तथा आदिचनल्लूर के साथ मिलकर ये खोजें तमिलनाडु के पुरातात्त्विक अभिलेख को और अधिक सुदृढ़ बनाती हैं तथा यह संकेत देती हैं कि करिवलमवंदनल्लूर का विकास पाषाण युग से संगम काल तक निरंतर होता रहा।
