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सामान्य अध्ययन-2: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

संदर्भ: भारत के उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि स्टेम सेल उपचार (Stem Cell Treatment – SCT) का उपयोग ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लिए नैदानिक उपचार के रूप में नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह एक अप्रमाणित और प्रयोगात्मक चिकित्सा है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • उच्चतम न्यायालय ने ‘यश चैरिटेबल ट्रस्ट एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य’ वाद में एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए, ASD (ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर) हेतु स्टेम सेल थेरेपी के अनियंत्रित प्रसार एवं नैदानिक प्रयोग पर गहरी चिंता प्रकट की, क्योंकि इसकी सुरक्षा एवं प्रभावकारिता की पुष्टि के लिए कोई भी ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
  • पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि केवल इसलिए कि स्टेम सेल ‘औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940’ के तहत “औषधियों” की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं, उनके उपयोग को स्वतः ही एक अनुमेय नैदानिक सेवा के रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
    • औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 भारत में दवाओं के आयात, निर्माण, वितरण और बिक्री को विनियमित करता है।

निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • न्यायालय ने कहा कि ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी वैध ‘सूचित सहमति’ के लिए आवश्यक “पर्याप्त जानकारी” की कानूनी आवश्यकता को पूरा नहीं करती है, क्योंकि स्वयं डॉक्टरों के पास ही इसके जोखिमों, लाभों और दीर्घकालिक परिणामों पर विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है।
  • भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के ‘स्टेम सेल अनुसंधान हेतु राष्ट्रीय दिशा-निर्देश’ (2017), ‘मानव रोगों के लिए स्टेम सेल थेरेपी की साक्ष्य-आधारित स्थिति’ (2021) और NMC की 2022 की सिफारिशों का हवाला देते हुए, न्यायालय ने पाया कि ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी में सुरक्षा या प्रभावकारिता के पर्याप्त, उच्च गुणवत्तायुक्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि अनुमोदित और निगरानी वाले नैदानिक परीक्षण के बिना रोगियों में स्टेम सेल का किसी भी प्रकार उपयोग किया जाना अनैतिक है और यह चिकित्सा कदाचार की श्रेणी में आता है।
    • स्टेम सेल हस्तक्षेप केवल अनुमोदित, विनियमित और सूक्ष्म निगरानी वाले नैदानिक परीक्षणों के भीतर ही अनुमेय हैं, जो केवल वैज्ञानिक ज्ञानवर्धन के लिए हैं, न कि रोगियों को दी जाने वाली नियमित चिकित्सा के रूप में।
  • न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि यदि वह सहमति दे भी देता है तो रोगी, अधिकार का मामला बताकर अप्रमाणित उपचारों की मांग नहीं कर सकते, क्योंकि वैध सूचित सहमति के लिए चिकित्सा के जोखिमों और लाभों के बारे में पर्याप्त जानकारी होना आवश्यक है।

निर्णय का महत्व

  • साक्ष्य-आधारित चिकित्सा को बढ़ावा: यह निर्णय दर्शाता है कि केवल वैज्ञानिक रूप से मान्य उपचार ही नैदानिक देखभाल के रूप में प्रदान किए जा सकते हैं।
  • सूचित सहमति के सिद्धांत का महत्त्व: निर्णय स्पष्ट करता है कि पर्याप्त और विश्वसनीय चिकित्सा जानकारी के बिना सहमति वैध नहीं है, जिससे रोगियों, विशेष रूप से संवेदनशील बच्चों को असुरक्षित चिकित्सा हस्तक्षेपों से बचाया जा सकेगा।
  • चिकित्सा व्यवसायीकरण और कदाचार पर रोक: ASD के लिए अनुमोदित स्टेम सेल थेरेपी को अनैतिक और कदाचार घोषित करके, न्यायालय शोषणकारी प्रथाओं पर रोक लगाता है और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में जन विश्वास को बनाए रखता है।

ऑटिज्म के बारे में

  • ऑटिज्म को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) भी कहा जाता है, और यह मस्तिष्क के विकास से संबंधित स्थितियों का एक विविध समूह है।
  • ASD उन स्थितियों का एक समूह है जिनके कारण सामाजिक संपर्क और संचार में कठिनाई आती है।
  • ऑटिज्म के लक्षण प्रारंभिक बाल्यावस्था में ही देखे जा सकते हैं, लेकिन इनकी पहचान अक्सर बहुत बाद में होती है।
  • वैज्ञानिक साक्ष्यों से पता चलता है कि ऑटिज्म में आनुवंशिक और पर्यावरणीय दोनों कारकों का योगदान हो सकता है।
  • NIMHANS के अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 18 मिलियन लोग ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित हैं।
  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, स्पष्ट रूप से ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर को एक निर्दिष्ट दिव्यांगता के रूप में मान्यता देता है जिस कारण ASD पीड़ित व्यक्ति कानूनी सुरक्षा, आरक्षण और कल्याणकारी लाभों के लिए पात्र हैं।
  • वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और समावेशन को बढ़ावा देने तथा ऑटिज्म से संबंधित मिथ्या धारणाओं की रोकथाम के लिए प्रतिवर्ष 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2007 में नामित किया गया था।
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