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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान-ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना, न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियां, कार्य और उत्तरदायित्व।   

संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को पेश करने की मंजूरी दे दी है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य भारत के उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि करना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • न्यायाधीशों की संख्या (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी, जिससे मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित न्यायाधीशों की कुल संख्या 38 हो जाएगी।
  • वेतन और बुनियादी ढांचे सहित वित्तीय खर्चों की पूर्ति भारत की संचित निधि से की जाएगी, जिससे संस्थागत सहायता सुनिश्चित होगी।
  • यह पिछले छह वर्षों में दूसरा विस्तार है, जो कार्यभार के आधार पर न्यायिक क्षमता के गतिशील समायोजन को दर्शाता है।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा

  • अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, प्रारंभ में उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीश थे। लेकिन इसमें यह भी लिखा है कि संसद कानून बनाकर इस संख्या को बढ़ा सकती है।
  • न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित करने के लिए संसद ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 पारित किया। जब भी संख्या बढ़ानी होती है, इसी अधिनियम में संशोधन किया जाता है।
  • यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि न्यायपालिका की क्षमता देश की जरूरतों और बढ़ते कार्यभार के अनुसार लचीली बनी रहे।

न्यायाधीशों की संख्या का ऐतिहासिक विकास

  • अपनी स्थापना के समय 1950 में, उच्चतम न्यायालय में 8 न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश सहित) थे।
  • उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के साथ शुरू हुई, जिसने न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) बढ़ाकर 10 कर दी।
  • मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर, अन्य न्यायाधीशों की संख्या को आगे चलकर 1960 में बढ़ाकर 13 किया गया, फिर 1977 में 17, 1986 में 25, 2008 में 30 और हाल ही में 2019 में बढ़ाकर 33 कर दिया गया।
  • 2026 का प्रस्ताव न्यायिक कार्यभार और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप क्रमिक विस्तार की इसी प्रवृत्ति को जारी रखता है।

बढ़ोतरी के पीछे तर्क

  • लंबित मामले: उच्चतम न्यायालय मामलों के भारी बैकलॉग का सामना कर रहा है, और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का उद्देश्य मामलों के निपटान की दर में सुधार करना और न्याय वितरण में देरी को कम करना है।
    • उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और मार्च 2026 तक लगभग 92,000 मामले लंबित थे।
  • न्यायिक कार्यों के दायरे का विस्तार: न्यायालय की भूमिका का विस्तार संवैधानिक व्याख्या, जनहित याचिका (PIL), शासन संबंधी मुद्दों और जटिल वाणिज्यिक विवादों तक हो गया है, जिससे कार्यभार बढ़ गया है।
  • मामलों की बढ़ती जटिलता: आधुनिक मुकदमों में प्रौद्योगिकी, आर्थिक विनियमन और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे शामिल होते हैं, जिनमें प्रति मामला अधिक समय लगता है और उन्हें निपटाने के लिए विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
  • संस्थागत दक्षता की आवश्यकता: अतिरिक्त न्यायाधीश होने से न्यायालय एक साथ अधिक पीठों का गठन कर सकेगा, जिससे दक्षता बढ़ेगी और त्वरित न्यायनिर्णयन सुनिश्चित होगा।

कदम का महत्व/निहितार्थ

  • न्याय तक बेहतर पहुँच: न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सुनवाई और निर्णयों में तेजी आएगी, जिससे नागरिकों की समयबद्ध और प्रभावी न्याय तक पहुँच में सुधार होगा।
  • विधि के शासन को मजबूती: मामलों के त्वरित निपटान से न्यायपालिका में जनता का विश्वास बढ़ेगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधि का शासन मजबूत होगा।
  • न्यायिक क्षमता में वृद्धि: न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से उच्चतम न्यायालय मौजूदा न्यायाधीशों पर बोझ डाले बिना संवैधानिक और नियमित मामलों को अधिक प्रभावी ढंग से संभालने में सक्षम होगा।
  • बेहतर मामला प्रबंधन: अधिक न्यायाधीश होने से विशेष पीठों का गठन और मामलों का आवंटन बेहतर हो सकेगा, जिससे न्यायिक प्रशासन की दक्षता बढ़ेगी।
  • आर्थिक विकास को समर्थन: वाणिज्यिक विवादों और नियामक मामलों के तेजी से समाधान से व्यावसायिक वातावरण और निवेशकों के विश्वास में सुधार होगा।
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