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सामान्य अध्ययन-2: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।
संदर्भ: तेहरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर बढ़ते तनाव के बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल ने ईरान के विरुद्ध समन्वित सैन्य हमले किए, जिससे संपूर्ण पश्चिम एशिया में एक व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।
अन्य संबंधित जानकारी

- 28 फरवरी 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल ने ईरान के विरुद्ध एक समन्वित सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी‘ (अमेरिका) और ‘ऑपरेशन लायन्स रोर‘ (इजराइल) कोड-नाम दिया गया। इसके तहत कई ईरानी शहरों में परमाणु केंद्रों, मिसाइल लॉन्चरों, सैन्य अड्डों और कमांड सेंटरों को लक्षित किया गया।
- प्रतिशोध स्वरूप, ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4′ शुरू किया, जिसके अंतर्गत इजराइल और खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे गए। इसमें कतर का अल उदेद एयर बेस, बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े (Fifth Fleet) का मुख्यालय, तथा कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सैन्य ठिकाने शामिल थे।
- यह संघर्ष हिंद महासागर तक विस्तृत हो गया, जहाँ खबरों के अनुसार एक अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के निकट ईरानी फ्रिगेट ‘IRIS देना‘ पर हमला किया। यह पारंपरिक ‘पश्चिम एशियाई युद्ध क्षेत्र’ से परे एक महत्वपूर्ण तनाव वृद्धि का संकेत है।
- इस संघर्ष ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा प्रवाह को बाधित कर दिया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल और भारी मात्रा में ‘तरलीकृत प्राकृतिक गैस’ (LNG) शिपमेंट के 20-25% के लिए एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है,को आंशिक रूप से बंद करने की धमकी दी है।

- यह घटनाक्रम वर्ष 2025 के इजराइल-ईरान युद्ध के बाद हुआ है, जब ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ के तहत 100 से अधिक ठिकानों पर हमले किए गए थे। यह संघर्ष ‘प्रतिरोध के अक्ष‘ (Axis of Resistance) के प्रभाव को रेखांकित करता है, जो हिज़्बुल्ला, हमास, पीआईजे (PIJ) और हूतियों जैसे ईरान समर्थित समूहों का एक गठबंधन है और क्षेत्रीय गतिशीलता को आकार देने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
संघर्ष के पीछे के कारण / कारक
- ईरान का परमाणु कार्यक्रम: ईरान वर्ष 1957 से परमाणु तकनीक पर कार्य कर रहा है, जिससे यह आशंका उत्पन्न हुई है कि वह परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। वर्ष 2015 के ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना‘ (JCPOA) ने ईरान की परमाणु गतिविधियों को प्रतिबंधित किया था, लेकिन 2018 में संयुक्त राज्य अमेरिका के हटने और पुनः प्रतिबंध लगाने, तथा जून 2025 में IAEA द्वारा ईरान को ‘गैर-अनुपालन’ घोषित करने के बाद क्षेत्रीय तनाव काफी बढ़ गया है।
- इजराइल का ‘बेगिन सिद्धांत‘: इजराइल ‘बेगिन सिद्धांत’ का पालन करता है, जो उसे उन देशों के विरुद्ध निवारक हमले करने की अनुमति देता है जिन पर ‘सामूहिक विनाश के हथियार’ विकसित करने का संदेह हो। यह सिद्धांत परमाणु खतरे को रोकने के लिए ईरान के विरुद्ध संभावित सैन्य कार्यवाही हेतु एक रणनीतिक औचित्य प्रदान करता है।
- ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव और ‘छद्म नेटवर्क‘: ईरान अपने सहयोगी समूहों के नेटवर्क के माध्यम से क्षेत्र में प्रभाव डालता है, जिसे “प्रतिरोध का अक्ष” कहा जाता है। इसमें लेबनान में हिज़्बुल्ला, गाजा में हमास, फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद और यमन में हूती शामिल हैं। इन समूहों ने बार-बार इजराइल और अमेरिकी हितों के विरुद्ध हमले किए हैं, जिससे ईरान क्षेत्रीय संघर्षों में एक केंद्रीय अभिनेता बन गया है।
- वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता: वर्ष 1979 से पहले, शाह के शासनकाल में ईरान और इजराइल के बीच सहयोगात्मक संबंध थे। इस्लामी क्रांति के बाद, ईरान इजराइल का विरोधी बन गया और उसने फिलिस्तीनी प्रतिरोध का समर्थन करने तथा इजरायली क्षेत्रीय हितों के विरोध में खुद को स्थापित करने का संकल्प लिया।
- गाजा युद्ध (2023) के बाद तनाव में वृद्धि: अक्टूबर 2023 में इजराइल पर हमास के हमले और गाजा में इजराइल की सैन्य प्रतिक्रिया ने ईरान समर्थित समूहों के साथ टकराव को और तेज कर दिया। इस घटना ने शत्रुता को गहरा किया और क्षेत्रीय छद्म संघर्षों में ईरान की संलिप्तता को और सुदृढ़ किया।
- कूटनीति की विफलता: विशेष रूप से ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता से संबंधित राजनयिक प्रयास, 2026 की शुरुआत में विफल हो गए। कूटनीति की विफलता ने शांतिपूर्ण विकल्पों को समाप्त कर दिया और ईरान से जुड़े खतरों के विरुद्ध अमेरिका-इजराइल सैन्य अभियान का मार्ग प्रशस्त किया।
वैश्विक निहितार्थ / प्रभाव
- ऊर्जा बाजार में अस्थिरता: मध्य पूर्व से होने वाली आपूर्ति में व्यवधान की आशंका के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और ‘ब्रेंट क्रूड’ के दामों में तेजी से वृद्धि हुई। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष जारी रहा, तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो सकती हैं।
- वैश्विक नौवहन हेतु खतरा: हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाले नौवहन की गति नाटकीय रूप से धीमी हो गई, जिससे समुद्री बीमा प्रीमियम में अत्यधिक वृद्धि हुई। कई शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों को ‘केप ऑफ गुड होप‘ के रास्ते डायवर्ट कर दिया है, जिससे पारगमन समय और माल ढुलाई लागत बढ़ गई है।
- वैश्विक आर्थिक अस्थिरता: वित्तीय बाजारों ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी, जिससे प्रमुख शेयर सूचकांकों में गिरावट आई और ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव देखा गया। शिपिंग लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने वैश्विक व्यापार पर दबाव और बढ़ा दिया है।
- व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का जोखिम: यह संघर्ष लेबनान, इराक, खाड़ी देशों और पूर्वी भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों तक फैल गया है, जिससे एक व्यापक ‘मध्य पूर्व युद्ध’ की आशंका बढ़ गई है जो इस क्षेत्र को और अधिक अस्थिर कर सकता है।
भारत के लिए निहितार्थ
- ऊर्जा सुरक्षा जोखिम: भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 55% मध्य पूर्व से आता है, जिसमें से 2.5–2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। तेल की बढ़ती कीमतें भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को बढ़ा सकती हैं, मुद्रास्फीति में वृद्धि कर सकती हैं और आर्थिक विकास की गति को धीमा कर सकती हैं।
- व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव: नौवहन मार्गों में व्यवधान से भारत के तेल, गैस, उर्वरक और पेट्रोकेमिकल इनपुट के आयात के साथ-साथ यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका को होने वाले निर्यात भी प्रभावित हो सकते हैं।
- भारतीय व्यवसायों पर प्रभाव: मध्य पूर्व में बड़े निवेश या उपस्थिति वाली कंपनियां, जैसे लार्सन एंड टुब्रो (L&T), डाबर और टाइटन, परिचालन और वित्तीय चुनौतियों का सामना कर सकती हैं। ईंधन की उच्च लागत और उड़ानों के बाधित होने से विमानन और पर्यटन क्षेत्र को भी नुकसान हो सकता है।
- कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर जोखिम: यह संघर्ष भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पहलों के लिए खतरा पैदा करता है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और चाबहार बंदरगाह शामिल हैं। चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच सुनिश्चित करता है।
- भारतीय प्रवासियों पर प्रभाव: खाड़ी क्षेत्र में लगभग 10 मिलियन (1 करोड़) भारतीय निवास करते हैं। बढ़ता संघर्ष या आर्थिक व्यवधान प्रेषण को प्रभावित कर सकता है, जो भारत के लिए विदेशी मुद्रा का एक प्रमुख स्रोत है।
- भारतीय बाजारों पर प्रभाव: बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट, रुपये का अवमूल्यन और बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि देखी गई, जो आर्थिक स्थिरता को लेकर निवेशकों की चिंताओं को दर्शाती है।
आगे की राह
- राजनयिक जुड़ाव को पुनर्जीवित करना: तनाव में और अधिक वृद्धि को रोकने के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से वार्ता आवश्यक है।
- वैश्विक अप्रसार तंत्र को सुदृढ़ करना: IAEA (अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों को अपनी निगरानी प्रणाली और राजनयिक प्रयासों को और अधिक सशक्त बनाना चाहिए।
- क्षेत्रीय तनाव में कमी: प्रमुख वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों को कूटनीति को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि इस संघर्ष को एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदलने से रोका जा सके।
- ऊर्जा विविधीकरण: भारत सहित मध्य पूर्वी तेल पर अत्यधिक निर्भर देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के प्रयासों को तेज करना चाहिए और अपने रणनीतिक तेल भंडार को सुदृढ़ करना चाहिए।
