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सामान्य अध्ययन 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: आयकर अधिनियम, 2025 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी हो गया है, जो भारत के कर प्रशासन में एक नए अध्याय की शुरुआत और ‘विकसित भारत’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आयकर अधिनियम, 2025 के विषय में
• यह छह दशक पुराने आयकर अधिनियम, 1961 का स्थान लेता है, जो देश के आयकर कानून को सरल और आधुनिक बनाने के एक व्यापक प्रयास को दर्शाता है।
• यह अंतर्निहित कर नीति में बदलाव किए बिना, सरल भाषा, सुव्यवस्थित संरचना और पाठक के अनुकूल प्रस्तुति के माध्यम से बेहतर स्पष्टता और अनुपालन में सुगमता की ओर एक बदलाव को चिह्नित करता है।
अधिनियम के उद्देश्य
• सरलीकरण: पुरातन भाषा और निरर्थक प्रावधानों को स्पष्ट, संक्षिप्त और आधुनिक कानूनी पाठ से प्रतिस्थापित करना।
• डिजिटल एकीकरण: मानवीय हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार को कम करने के लिए ‘फेसलेस’ (परोक्ष) मूल्यांकन और डिजिटल अनुपालन को सक्षम बनाना।
• करदाता-केंद्रित दृष्टिकोण: रिटर्न दाखिल करने की सुगमता में सुधार करना, मुकदमेबाजी को कम करना और पारदर्शिता बढ़ाना।
• वैश्विक संरेखण: डिजिटल संपत्ति के कराधान और वैश्विक आय सहित समकालीन आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना।
आयकर अधिनियम, 2025 के मुख्य बिंदु
• ‘कर वर्ष’ (Tax Year) की शुरुआत: स्पष्टता बढ़ाने और अनुपालन को सरल बनाने के लिए, अधिनियम ने भ्रमित करने वाले शब्दों “निर्धारण वर्ष” और “पिछले वर्ष” को एक एकल ‘कर वर्ष’ से प्रतिस्थापित कर दिया है। इसे 1 अप्रैल से शुरू होने वाले 12 महीने के वित्तीय वर्ष के रूप में परिभाषित किया गया है।
• योजनाएं बनाने की शक्ति: अधिनियम केंद्र सरकार को निम्नलिखित माध्यमों से नई योजनाएं तैयार करने के लिए अधिकृत करता है:
- तकनीकी रूप से व्यवहार्य सीमा तक करदाता या किसी अन्य व्यक्ति के साथ साक्षात्कार को समाप्त करना, और
- मितव्ययिता और कार्यात्मक विशेषज्ञता के माध्यम से संसाधनों के उपयोग को इष्टतम बनाना।
• सरलीकृत अनुपालन: बिखरे हुए प्रावधानों को समेकित किया गया है। उदाहरण के लिए, सभी TDS (स्रोत पर कर कटौती) नियमों को अब धारा 393 के तहत समूहित किया गया है, जिससे उन्हें खोजना और उनकी व्याख्या करना आसान हो गया है।
• डिजिटल-प्रथम प्रवर्तन: यह “वर्चुअल डिजिटल स्पेस” (जैसे ईमेल, क्लाउड, सोशल मीडिया, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म) की अवधारणा पेश करता है और “वर्चुअल डिजिटल एसेट्स” का विस्तार करता है ताकि क्रिप्टोकरेंसी जैसी सभी मूल्य-युक्त, क्रिप्टोग्राफी-आधारित डिजिटल संपत्तियों को शामिल किया जा सके।
• MAT और AMT के लिए स्पष्ट संरचना: स्पष्टता बढ़ाने के लिए न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) और वैकल्पिक न्यूनतम कर (AMT) से संबंधित प्रावधानों को अलग-अलग उप-वरों में रखा गया है।
• रिटर्न अद्यतन करने के लिए विस्तारित समय: करदाता अब संबंधित निर्धारण वर्ष की समाप्ति से चार वर्ष तक अपने रिटर्न को संशोधित कर सकते हैं। इससे अतिरिक्त दंड या कर के बोझ के बिना त्रुटियों को सुधारना संभव होगा।
• पुनः निर्धारण की अवधि में कमी: कर निर्धारण को फिर से खोलने की समय सीमा को घटाकर पाँच वर्ष कर दिया गया है, जो करदाताओं को अधिक निश्चितता प्रदान करता है और लंबे समय तक चलने वाली जांच को कम करता है।
आयकर अधिनियम 1961 से आयकर अधिनियम 2025 में स्थानांतरण के पीछे तर्क
• व्यापक संशोधन: इस अधिनियम में वित्त अधिनियमों और 19 कराधान कानून संशोधन विधेयकों के माध्यम से लगभग 65 संशोधन और 4,000 से अधिक परिवर्तन किए गए थे। इसे अद्यतन रखने के प्रयासों के बावजूद, इन परिवर्तनों ने इसे अत्यंत विस्तृत और जटिल बना दिया था।
• कर आधार में कमी: समय के साथ दी गई विभिन्न छूटों और प्रोत्साहनों ने कर आधार को महत्वपूर्ण रूप से कम कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप मुकदमों में वृद्धि, उच्च प्रशासनिक लागत और अनुपालन का भारी बोझ उत्पन्न हुआ।
• जटिल भाषा: यह अधिनियम पारंपरिक कानूनी भाषा में लिखा गया था, जिसमें लंबे वाक्य और अनगिनत ‘परंतुक’ (Provisos) शामिल थे। इस कारण एक औसत करदाता के लिए इसे समझना कठिन था।
• खंडित संरचना: निरंतर संशोधनों और नई प्रविष्टियों के संचय से इसकी संरचना खंडित हो गई थी। अप्रचलित प्रावधानों (जो अब उपयोग में नहीं थे) की उपस्थिति ने इस जटिलता को और बढ़ा दिया था।
• प्रत्यक्ष कर सुधारों का दृष्टिकोण:
- यह बदलाव दक्षता, पारदर्शिता और अनुपालन में सुगमता लाने के उद्देश्य से किए गए व्यापक प्रत्यक्ष कर सुधारों के अनुरूप है।
- इसका लक्ष्य कर आधार को विस्तृत करना, विवादों को कम करना, डिजिटल प्रवर्तन का लाभ उठाना और बदलती आर्थिक एवं तकनीकी वास्तविकताओं के अनुसार एक सरल, करदाता-अनुकूल प्रणाली का निर्माण करना है।
अधिनियम से संबंधित प्रमुख चिंताएँ
• विस्तारित अन्वेषण शक्तियाँ और निजता संबंधी चिंताएँ: यद्यपि आयकर विधेयक, 2025 का उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना है, किंतु यह ऐसे प्रावधान पेश करता है जो डिजिटल निजता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
• डिजिटल सूचना तक बढ़ी हुई पहुँच: आयकर अधिनियम, 1961 के विपरीत, जो केवल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के निरीक्षण और भौतिक पहुँच की अनुमति देता था, नया कानून करदाताओं के लिए “उचित तकनीकी सहायता” प्रदान करना अनिवार्य बनाता है, जिसमें पासवर्ड साझा करना भी शामिल है।
• पहुँच का व्यापक दायरा: स्पष्ट सीमाओं के अभाव में, अधिकारियों को व्यक्तिगत ईमेल, सोशल मीडिया अकाउंट और अन्य निजी जानकारी जैसे डिजिटल डेटा के व्यापक दायरे तक पहुँच प्राप्त हो सकती है।
• सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने की शक्ति: यदि करदाता सहयोग करने से इनकार करते हैं, तो अधिकारियों को ‘एक्सेस कंट्रोल’ (पहुँच नियंत्रण) को दरकिनार करने और सीधे कंप्यूटर सिस्टम में प्रवेश करने का अधिकार दिया गया है।
• दुरुपयोग और अतिरेक की चिंताएँ: ये विस्तारित शक्तियाँ संभावित दुरुपयोग की आशंका पैदा करती हैं, जिससे नागरिकों के डिजिटल निजता के अधिकार को खतरा हो सकता है और प्रशासनिक अतिरेक को बढ़ावा मिल सकता है।
आगे की राह
• निजता सुरक्षा उपायों का सुदृढ़ीकरण: डिजिटल पहुँच के दायरे पर स्पष्ट कानूनी सीमाएँ निर्धारित की जानी चाहिए। दुरुपयोग को रोकने के लिए पूर्व न्यायिक/स्वतंत्र अनुमोदन, आनुपातिकता परीक्षण और कठोर डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल जैसे सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए।
• डेटा सुरक्षा ढांचे के साथ संरेखण: कर प्रवर्तन और निजता के अधिकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए भारत के डेटा सुरक्षा शासन (जैसे डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढांचा) के साथ निरंतरता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
• विस्तृत नियम और मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs): अस्पष्टता को दूर करने और समान कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए “उचित तकनीकी सहायता”, डिजिटल सिस्टम तक पहुँच और डेटा प्रबंधन पर सटीक दिशा-निर्देश तैयार किए जाने चाहिए।
• प्रवर्तन और करदाता अधिकारों के बीच संतुलन: शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करके, कार्यवाहियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करके और करदाता की गोपनीयता की रक्षा करके अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
• आवधिक समीक्षा और हितधारक परामर्श: उभरती चिंताओं को दूर करने और प्रावधानों को परिष्कृत करने के लिए उद्योग जगत, पेशेवरों और नागरिक समाज के साथ परामर्श के माध्यम से आयकर अधिनियम, 2025 की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए।
